‘Prem’, a poem by Kajal Khatri

मेहंदी का हल्का रंग देखकर
ही डर जाती हैं
उनका प्रेम कम होगा सोचकर
ये लड़कियाँ कितना निश्छल प्रेम करती हैं

माँग भरते से अगर नाक पर
गिर जाए सिन्दूर
तो पति ख़ूब प्रेम करेगा ये सोच-सोचकर सिन्दूरी हो जाती हैं
ये लड़कियाँ कितना निश्छल प्रेम करती हैं

बाएँ गाल पर तिल है तो
सास की प्यारी होगी
सोचकर निश्चिन्त हो जाती हैं
ये लड़कियाँ कितना निश्छल प्रेम करती हैं

और ये निश्छल प्रेम
बलि चढ़ जाता है
पहली रसोई
पहली रात को ही
और अब उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता मेहंदी के हल्के रंग से
नाक पर गिरे सिन्दूर से
और बाएँ गाल के तिल से
ये सब हल्के.. हल्के.. और हल्के होते जाते हैं
उसके आँसुओं से
जिन्हें छिपाती रहती है
चूल्हे के धुएँ में
और हर सुबह और रात
देखती है
प्रत्येक मिथक को टूटते,
साथ-साथ स्वयं को भी…

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