1

लड़कियाँ अपने प्रति क्रूर होती हैं
बहुत क्रूर
लड़कियाँ नाज़ुक हैं और उनकी प्रतिज्ञा भी नाज़ुक है
इतनी आसानी से टूट जाती है
सूखी फोग की टहनी की तरह
पत्थरों से ख़ून टपकता होगा कहीं
करुणा टपकती कभी नहीं देखी
मेरी शिकायत ठण्डे सफ़ेद संगमरमर से है

2

यह प्रेम की पीड़ा है अथवा समय की
तुम इतनी गहराई तक महसूसते हो
क्या कोई बैरागण हो
अथवा कोई संत?

चन्द्रमा आसमान की सतह पर एक छोटा-सा सुराख है
ग़ालिब ने कहा था ऐसा
चन्द्रमा उबरता है, फुटपाथ की दरारों को भरता है
घबराकर बालकनी में झाँकता है
मगर बालकनी की घबराहट को कभी नहीं पाट पाता
चाँदनी के ताप को नापने कोई थर्मामीटर नहीं बना अभी तक
जैसे प्रेम के ताप को नहीं नापा जा सकता

3

सिकुड़े हुए शहरों में
लूण-रोटी और चाय…

लम्बी आंधियों के बाद वाले घरों में
लाल सूरज डूब जाता है
लाल धोरों को निराश करके
ठूँठती खेजड़ियों की नसें तन जाती हैं
पीली सुनहरी रेत वाली पगडंडी पर
आक-खींपों की झाड़ियों के बीच में से
एक चंचल झिलमिलाहट चलती है
एक जोड़ी चमड़े के कारी वाले जूतों
के सहारे

4

हारने की कला में महारत हासिल करना मुश्किल नहीं है
इतने सारे सबक़ इरादों से भरे हुए लगते हैं
इन चीज़ों का खो जाना कोई आपदा नहीं है
मैंने दो शहर खो दिए दो नदियों वाले
मैं एक देश खो रही दो महासागरों वाला

5

मैं शिकायत कर सकती हूँ बाँसुरी की तरह
उसी के लय वाले लहजे में
मैं रुदन कर सकती हूँ नगाड़ों की तरह
तबलों की तीन-ताल के संग मेरा विलाप चलता है
आपने सुरम्य धोरों में कभी सारंगी वादन नहीं सुना
कितना सुबकती है वह
मीरा के इकतारे के विछोह में!

Book by Pratibha Sharma:

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