हम सामाजिक परम्पराओं से निर्वासित हुए लोग थे
हमारे सर पर आवारा और उद्दण्ड का ठीकरा लदा था
हम ने किसी का नुक़सान नहीं किया था
न ही नशे में गालियाँ सुनायी थीं
हम ने बस प्रेम किया

हम इतने परिपक्व कभी नहीं हुए कि—
प्रेम के दर्शन या प्रदर्शन के दायरों को तय कर सकें
हमें समाज, राजनीति, न्याय, हिंसा, बाज़ार, क़ानून, धर्म—
इन सबकी छटाँक-भर भी समझ नहीं थी

हम ने बस प्रेम किया
जी भरकर प्रेम किया

हम ने कविताओं के सापेक्ष प्रेम किया
हम ने प्रेम में महसूस किया कि हमारे नाख़ून के पोरों से फूल उगने लगे
हम गले लगे तो पिघलने लगे
हम ने जब चूमा तो होंठों से पराग रिसने लगे

हम ने जगह, समय, संस्कृति की मर्यादा नहीं समझी
हम ने एक-दूसरे की आँखों में कहा— ‘प्रेम गुनाह नहीं है’
सड़क पर पेशाब करते बुज़ुर्गों ने हमें अश्लील बताया
सम्भोग करते कुत्ते को पत्थर मारना छोड़ लोगों ने हमारे नृत्य को देखा
और समाज की बुराई के लिए ज़िम्मेदार ठहराया

हम ने रोने के लिए एकान्त नहीं ढूँढा
बस प्रेमी का कंधा हमारा सब-कुछ था
हम जब उदास हुए, भीड़ ने हमें विचलित नहीं किया
हमने बस ख़ुद को प्रेमी की बाँहों में छुपा लिया

लोगों ने कहा— ‘ये बेतरतीब है’
हमारा हुलसकर चूमना, लगातार हँसना
समाज को विचलित करने के लिए काफ़ी था

हमें समूचा शहर बग़ीचा लगता था
और हम क्रौंच-युगल थे
हम साथ उड़ते और पानी की सतह पर चोंच से उकेर देते—
‘प्रेम करना गुनाह नहीं है’

हम ने ट्रेन के दरवाज़ों पर खड़े होकर विदा कहा
किन्नरों ने मुस्कराते हुए हमारी नज़र उतारी
गलियों से गुज़रते शरीफ़ों ने नथुने फुलाकर हमें वेश्या कहा
वो औरतें जिन्हें सब बाज़ारू बुलाते हैं
छत से आवाज़ देकर कह रही थीं—
“प्रेम करो मेरे बच्चे! ये गुनाह नहीं है!”

हम ने वैसे प्रेम किया जैसे माँ सड़क पर अपने बच्चे को पुचकारकर करती है
हम ने वैसे हँसी-ठिठोली की जो बचपन में बाबा की पीठ पर बाज़ार घूमते की जाती रही
हम बेपरवाह थे, हम उनकी नज़रों से गिरते जा रहे थे जो परम्पराओं के दुहाई देते थे

हम मंदिर की सीढ़ियों पर झगड़ते और
अस्पताल में सुलह करते
हमें ईश्वर से अधिक, खोने का भय था
लोगों के ताने पर बहरे होने वाले हम, चुप्पियों पर रोने लगते थे

हम इतने नासमझ रहे कि कभी न जान पाए
हॉर्न बजाती एम्बुलेंस की आवाज़ न सुनने वाले लोग
हमारी धीमी आवाज़ में कहे गए ‘आई लव यू’
पर पलट पड़ते थे

धार्मिक जुलूसों में हमारा प्रवेश निषेध था
क्योंकि उनका मानना था, हाथ पकड़कर चलना ईश्वर की पवित्रता भंग कर सकता है
ये सब हमारे लिए कभी मायने नहीं रखा
हम कभी इस बात से उदास नहीं हुए कि हम दुत्कारे हुए हैं

हम उन दिनों तितली बन गऐ थे
सारे बग़ीचे में उड़ते और प्रेम करते
हमने बस प्रेम किया
जी भरकर प्रेम किया

एक दफ़ा हम बड़े से पेड़ की टहनी पर पंखों के सौंदर्य में मंत्रमुग्ध थे
हम दोनों ने साथ अपने पंखों को रस्सी से निचोड़ दिया
हमारे पंखों से फूल झड़ रहे थे
हम उड़ गए थे… फूल की पंखुरियाें से यह लिखकर—
‘प्रेम करना गुनाह नहीं है!’

कैलाश वाजपेयी की कविता 'प्यार करता हूँ'

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