हवाओं पर सवार होकर आया था प्रेम!
बेवजह मुस्कराने लगी थी लड़की
वह मुस्कानें लुटाने लगी थी प्रिय के साथ ही
पशु, पक्षियों और वनस्पतियों पर भी

द्वार पर रखी नाँद के पानी में स्नेह घोल
अगोरने लगी थी छुट्टा पशुओं की राह
वह भी महसूसती थी उनके साथ
घर से निकाले जाने का बेबस दर्द

बिल-बिल कर भगायी जाती बिलैया को बुला लेती थी पुचकारकर
कटोरी में रखा दूध उसके सामने रखती लड़की
अपनी फ़िक्र को भी घोल देती थी दूध की उजास में

चिड़ियों के दाने-पानी को सिझा देती थी अपनी चंचलता में
ख़्वाहिशों में पगे ये दाने खाकर चहचहा उठती थीं चिड़ियाँ
प्रेम से भर जाता था चिड़ियों का उन्मुक्त गगन

फूलों को छोड़कर सहलाती थी काँटों के सिरे
वह पढ़ लेती थी बदसूरत काँटों का घायल हृदय
फूलों के सामने अनदेखा किए जाने की पीड़ा से भरे
अकारण तीक्ष्ण होकर नहीं चुभ जाते ये काँटे
व्यवस्था से उपजे खोखलेपन को भर देती थी अपने स्पर्श से

प्रेम से भरी लड़की का प्रेम बरसता था
तमाम अबोलों, असहायों, निराश्रितों पर
तमाम दिन लोगों के दर्द से बातें करती लड़की
अंततः बदल देती थी उस दर्द को प्रेमभरी आश्वस्ति में

लड़की ने जान ली थी ‘प्रेम’ के ‘प’ की सार्थक व्याख्या
उसने पाया हुआ प्रेम लौटाना सीख लिया था।

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