मैं नहीं मानता उसे प्रेम
जिसमें एक व्यक्ति को नसीब हो रसातल
दूसरे को मिले उन्मुक्त आकाश,
इसे नहीं कहा जा सकता इंसाफ़।

‘दोनों में बराबर बँटें दुःख’
यह सुनने में लग सकता है तर्कसंगत,
पर आँसुओं में तरबतर भूमि
नहीं हो सकती
प्रेम के पल्लव के लिए आदर्श

मैं ख़ारिज करता हूँ
प्रेम में मिट्टी हो जाने की अवधारणा,
मेरा मानना है
चिता पर नहीं उगाया जा सकता गुलाब

हाँ, वह हो सकता है प्रेम
जिसमें निखार हो
एक में नहीं,
प्रेम में सिक्त दोनों कायाओं का।

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