पुल की आत्मकथा

‘Pul Ki Aatmakatha’, a poem by Pranjal Rai

मेरी देह पर देखो कितने पैरों के निशान हैं!
जो गुज़रे मेरी पीठ पर चलते हुए,
वे अगली सदी में चले गए
और मेरी जड़ें धँसी रहीं इस पार समय के।
जो गुज़रे, वे गुज़रे मेरी आँखों को रंगकर अपनी परछाइयों के पानी से,
जो गुज़रे, वे गुज़रे अपनी साँस का एक टुकड़ा मेरे सीने में छोड़कर।
अब आँखें धुँधली हैं
और देह कमज़ोर।
मेरे सीने पर लिपटे हुए शैवाल
मेरी अप्रासंगिकता पर मुहर लगाते हैं।
और मैं जी चुका हूँ कई कई उम्र,
मैं, एक निर्जन पुल हूँ
और टूट जाना चाहिए था अब तक मुझे,
फिर भी अब तक खड़ा हूँ,
हालाँकि मृत्यु का भय नहीं है मुझे,
किन्तु सालों से थामकर रखा है मैंने
अपनी टूटती नसों को,
क्योंकि हर साल इन्हीं महीनों में
एक गौरैया मेरी हथेली पर अपने अण्डे रख जाती है।

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