‘Ramkhilawan Jeena Seekh Raha Hai’, a poem by Nirmal Gupt

तवा चूल्हे पर था
रामखिलावन की तर हथेलियों पर
रोटी ले रही आकार
तभी सीधे गाँव से ख़बर चली आयी
बड़के चाचा नहीं रहे

अब वह क्या करे
रोटी बनाए,
कुछ खाए या
फिर शोक मनाए…?

रामखिलावन अपने गाँव से इतनी दूर
अपनों को रुलाकर
उनकी भूख की ख़ातिर ही तो आया है,
वह यहाँ गुलछर्रे उड़ाने
रोने बिसूरने नहीं आया,
वह कमाएगा तभी तो
कुछ खाएगा,
घर-गाँव के लिए
उसमें से कुछ बचा पाएगा

रामखिलावन गाँव छोड़ चला तो आया
पर उससे गाँव छूटा कहाँ,
वह यहाँ सुदूर शहर में आ धमकता है
ख़ूबसूरत यादें लिए,
कभी आँखों के लिए पानी
तो कभी घर लौट आने की
मनुहार लिए,
गाँव से कभी सिसकियाँ आती हैं
तो कभी हौंसला
और कभी-कभी दुखदायी ख़बरें भी

रामखिलावन हठयोगी है
वह बिना हथियार के भी
लड़ना सीख चुका है,
अपना काम करना कभी नहीं भूलता
वह दुःख-सुख की
परम्परागत परिभाषा से
बाहर निकल आया है
पर निष्ठुर नहीं हुआ है वह

रामखिलावन के भीतर
अभी भी उसका गाँव बसा है,
जिसकी याद में वह सुबकता भी है
मन ही मन रीझता भी है
शोकाकुल भी होता है
वहाँ की हर अनहोनी पर,
पर वह अपने काम के समय
सिर्फ़ काम करता है

बाक़ी बचे-खुचे समय में वह वही
गाँव वाला रामखिलावन होता है
जिसे बड़के चाचा का यूँ चले जाना
बहुत हिला देता है
पर उसके हाथ, इस ख़बर को पाकर भी
थमते नहीं, रोटी बनाते हैं
वह रोटियों का मर्म जानता है
उन्हें खाए बिना तो
ठीक से रो पाना भी मुश्किल है

रामखिलावन बहुत उदास है
पर वह ज़ुबानी मातमपुर्सी के लिए
दौड़ा-दौड़ा गाँव नहीं जाएगा,
वह अब शहर में रह कर
सलीक़े से जीना सीख रहा है…

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