साठ पार का आदमी

‘Saath Paar Ka Aadmi’, a poem by Nirmal Gupt

साठ पार के आदमी को
घुटने मोड़ कर चारपाई पर बैठे रहना चाहिए
उठते-बैठते हर बार
ज़ोर से कराहना चाहिए
फूल, तितली, ख़ुशबू और प्यार की बात
मन ही मन बुदबुदाना निषेध है

उसे अतीत की चादर को कसकर जिस्म से
हरदम लपेटे रहना चाहिए
उसकी देह से पसीने और उदासी की गंध
हर समय आनी चाहिए
गमन की भविष्यवाणी करनी चाहिए
रोज़ मौसम विभाग की तरह

उसे अपने अन्तिम क्षणों का रिहर्सल
नियमित रूप से करना चाहिए
लोगों को हरदम यक़ीन दिलाना चाहिए
कि बस कुछेक दिन की बात और है
उसे करनी चाहिए
जीने से अधिक
सिर्फ़ मरने की फ़िक्र

उसे हर उबासी के साथ दोहराना चाहिए
प्रभु बहुत हुआ, अब तो उठा ही ले
फिर सहमते हुए आसमान की ओर देखना चाहिए
कहीं आसमान के कान तो नहीं उग आये
प्रार्थनाओं को करते हुए
इस कदर जल्दबाज़ी करना ठीक नहीं

साठ की दहलीज़ लाँघते हुए
जोड़-घटा का अंकगणित भूल जाना चाहिए
जिस्म को छोड़ देना चाहिए अकेला
हर बात पर बेबसी की नुमाइश करते हुए
इस तरह हँसना चाहिए
कि वजह का सुराग़ तक किसी को न मिले

साठ पार के आदमी को
क़ायदे से तो किसी कौए की तरह
उतर जाना चाहिए निर्जन बियाबान में
जहाँ आवाजें खो जाती हों
द्रुम लताओं की गहराइयों में
पत्तियाँ हवा के झोंकें में भी सरसराती न हों

साठ पार गया आदमी
कोई अलार्म घड़ी नहीं रखता
यदि होती भी है तो
वह उसके जाग जाने के बाद बजती है
कलगी वाला मुर्गा बाँग देने के मामले में
उससे रोज़ हार जाता है

उसके हर कथोपकथन में होती हैं
निजी जीवन से जुड़ी
झूठ से लबरेज़ शौर्य गाथाएँ
जिनका पुनर्पाठ करते
वह कभी नहीं थकता
कण्ठस्थ कर लेता है

साठोत्तर का आदमी
दरअसल बड़ा शातिर होता है
उम्र भर एकत्रित की गयी चालाकियों का
बख़ूबी इस्तेमाल करता है
हर ज़रूरी ग़ैरज़रूरी बात पर
बेवजह बेआवाज़ सुबकता है

वह बड़ी शिद्दत से
वक़्त के सरोंते से
काट पाता है एक-एक दिन को
कठा सुपारी की तरह

अपना पूरा नाम और
असल उम्र बताने में हकलाता है

साठ पार का आदमी वक़्त रहते
निःशब्दता के आर-पार चला जाना चाहता है!

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