लड़का और लड़की की
अपने-अपने घरों में
इतनी भी नहीं चलती थी
कि पर्दों का रंग चुनने तक में
उनकी राय ली जाती

उनकी जेबों की हालत ऐसी थी
कि आधी-आधी बाँटते थे पाव-भाजी
एक्स्ट्रा पाव के बारे में सोच भी नहीं सकते थे

अभिजात्य सपने देखने के मामले में
बहुत संकरी थी
उनकी पुतलियाँ

फिर भी वे शहर के
सबसे ख़ुश दो लोग थे

क्योंकि वे
घास के एक विस्तृत मैदान में
धूप सेंकते हुए
आँखों पर किताब की ओट कर
कह सकते थे
कि उन्हें प्रेम है एक-दूसरे से!

देवेश पथ सारिया
हिन्दी कवि-गद्यकार एवं अनुवादक। पुरस्कार : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (2023), स्नेहमयी चौधरी सम्मान (2025)। प्रकाशित पुस्तकें : नूह की नाव, अदृश्य आत्मीय की टोह में (कविता संग्रह); स्टिंकी टोफू (कहानी संग्रह); छोटी आँखों की पुतलियों में (कथेतर गद्य); हक़ीक़त के बीच दरार, यातना शिविर में साथिनें (अनुवाद)। संपादन : गोल चक्कर वेब पत्रिका।