समझना कहाँ आसान है

‘Samajhna Kahan Asan Hai’, a poem by Rahul Boyal

स्वाति नक्षत्र में उधर कोई अब्र टूटा
और इधर मेरा सब्र छूटा
कि गिरा भी तो बूँद भर ही क्यों गिरा?
क़ुदरत के क़ायदे भी समझना कहाँ आसान है
कैसे गोल क़तरा ओस का
दूब की नोंक पर ठहर सकता है!

मैंने फैलायी बाँहें तो सारी धूप सिमट के आ गयी
और सारी छाँव तुम्हारी ज़ुल्फों तले रह गयी
अब दुनिया इंतज़ार में है सालों से
कि कब हम मिलें और शाम हों
मुहब्बत के क़ायदे भी समझना कहाँ आसान है
कैसे बिन मिले कोई रूह को
सतरंगी कर गुज़र सकता है!

हथेलियाँ खोलते ही क़िस्मतें खुल जाती हैं
अज़ाब से सनी छातियाँ भी धुल जाती हैं
कोई गंगा गगन से दौड़कर आए
टूटकर बुलाए कोई तो सब छोड़कर आए
रिवायतों के क़ायदे भी समझना कहाँ आसान है
बेमुरव्वत रस्में तोड़ देने से
वक़्त का कोई टुकड़ा सँवर सकता है।

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