मैंने जब भी तुम्हें पुकारा
तुम्हें आवाज़ लगायी
वह तुम तक पहुँचने में असमर्थ रही

ऊँची-ऊँची दीवारों को लाँघ पाने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। हाँ, ये वही दीवारें हैं, जिनमें लगी काँच की खिड़कियों से सिर्फ़ बाहर देखा जा सकता है, भीतर नहीं।

यहाँ के पंछी
मुझे पहचानते तक नहीं

मैं दानें डालता हूँ
वे मुझे शक की निगाह से देखते हैं
उनके लिए भी
मेरी उपस्थिति सन्दिग्ध है

ख़ुद को अभिव्यक्त करने के लिए
आश्वस्त होकर
जब मैंने कविता को चुना
मुझे मेरी जाति ने निराश किया
उससे भी ज़्यादा निराश किया
मुझे मेरे लोगों ने

गणित का डर
बचपन से आज तक बना रहा है
आज भी स्वप्न में कभी-कभी
डरा हुआ गणित की परीक्षा दे रहा होता हूँ
एक ही प्रश्न-पत्र कई बार पलट रहा होता हूँ
समीकरण सुलझाते हुए
क़लम की स्याही अचानक ख़त्म हो जाती है
अधिकांश प्रश्न ऐसे हैं
जिनके उत्तर मुझे नहीं मालूम
प्रश्न का उत्तर खोजना बहुत कठिन काम है
यह पृथ्वी एक प्रश्न है
जीवन एक प्रश्न है
मृत्यु एक प्रश्न है
मनुष्य एक प्रश्न है
समाज एक प्रश्न है
शहर एक प्रश्न है
गाँव एक प्रश्न है
लोकतन्त्र एक प्रश्न है
देश इस दौर का सबसे बड़ा प्रश्न है ।

आज जब मेरी उपस्थिति सन्दिग्ध है
मेरी जाति सन्दिग्ध है
मेरा प्रेम सन्दिग्ध है
मेरी कविता सन्दिग्ध है
मेरी आवाज़ सन्दिग्ध है
हो सकता है
किसी दिन मेरी लाश सन्दिग्ध अवस्था में पायी जाए…

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गौरव भारती
जन्म- बेगूसराय, बिहार | शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली | इन्द्रप्रस्थ भारती, मुक्तांचल, कविता बिहान, वागर्थ, परिकथा, आजकल, नया ज्ञानोदय, सदानीरा,समहुत, विभोम स्वर, कथानक आदि पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित | ईमेल- [email protected] संपर्क- 9015326408

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