सन्नाटों में स्त्री

‘Sannaton Mein Stree’, a poem by Om Purohit Kagad

दिन भर
आँखों से ओझल रही
मासूम स्त्री को
रात के सन्नाटों में
क्यों करते हैं याद
ऐ दम्भी पुरुष!

दिन में
खेलते हो
अपनी ताक़त से खेल,
सूरज को भी
धरती पर उतारने के
देखते हो सपने,
ऐसे वक़्त
याद भी नहीं रखते
कौन हैं पराये
कौन हैं अपने!

साँझ ढलते ही
क्यों सताती है
तुम्हें याद स्त्री की,
भयावह रातों का
सामने करने को
साहस तुम्हारा
कहाँ चला जाता है?
ग़ौर से देखो
तुम्हारे भीतर भी है
एक स्त्री
जो डरती है तुमसे,
वही चाहती है साथ
सन्नाटों में अपनी सखी का!

यह भी पढ़ें: ओम पुरोहित ‘कागद’ की कविता ‘वह लड़की’

Author’s Book: