‘Wah Ladki’, a poem by Om Purohit ‘Kagad’

सामने के झोपड़े में
रहने वाली वह लड़की
अब सपने नहीं देखती।

वह जानती है कि सपने में भी
पुरुष की सत्ता आ टपकती है
और कभी भी
उसके अबला होने का
लाभ उठा सकती है।

वह यह भी जानती है
कि सपना हो या यथार्थ
पुरुष की माँग पूरे बिना
उसकी माँग
कभी भी भरी नहीं जा सकती।
इसीलिये अब वह
झोपड़े में निपट अकेली
यथार्थ को भोगती है
और सपने टालती है।

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ओम पुरोहित 'कागद'
(5 जुलाई 1957 - 12 अगस्त 2016)

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