क़स्बाई लड़की

न्यू-इयर कार्डस अभी भी जहाँ-तहाँ से आकर डाकखानों की मेज़ पर जमा हो रहे थे, लेकिन आलसी क़स्बा हफ़्ते भर से चिपकाए नएपन के मुलम्मे को उतारकर पुराने ढर्रे पर लौटने लगा था।

‘यानी फिर वही घण्टों लम्बी चर्चाएँ, फुसफुसाती आवाज़ में ख़बरों का आदान-प्रदान और बुराई-भलाई…’ फ़रियाद मुस्कुरा दिया। उसे याद आया वो दिन, जब उसने पहली बार शहर से चालीस किलोमीटर दूर बसे इस क़स्बे में क़दम रखा था। उफ़! दूर तक न कोई सिनेमा हॉल, न पिकनिक स्पॉट। शुरुआत में उसे चिढ़ हुई, लेकिन धीरे-धीरे यही बेढंगी, बकवास जगह उसे अच्छी लगने लगी। यहाँ के लोग, यहाँ की राजनीति, यहाँ का बाज़ार, यहाँ की हर बात। मगर सबसे अच्छी लगी, पिछली गली में रहने वाली क़स्बाई लड़की!

गेहूँ पर धूप की परत जैसी क़स्बाई लड़की अपनी सावन-सावन आँखों से आसमान की ओर ऐसे देखती, जैसे धरती को देख रही हो। जबकि उसका धरती को देखना, आसमान देख लेने जैसा होता। कई बार क़स्बाई लड़की के धरती-आसमान पानी का रंग ओढ़ लेते। तब वो एक कश्ती बन जाती- भँवर में किनारा तलाशती कश्ती, किनारों में भँवर उठाती कश्ती। क़स्बाई लड़की के छोटे-छोटे पैरों में हिरन क़ैद थे, एक नहीं, कई सारे हिरन। फिर भी वो बहुत धीमे चलती थी, ऐसे जैसे पाँव ख़ाली हों और रास्ता अंगार। बात करने में उसे लाज आती थी। इतनी कि लाल हो जाते थे उसके गाल और काँपने लगती थीं दुपट्टे से लिपटी लम्बी-पतली उंगलियाँ।

क़स्बाई लड़की बहुत कम बोलती थी, मगर गहरे सन्नाटों में उसके होठ फड़फड़ाने लगते थे और तब खिड़कियों के रास्ते, सुनसान सड़क पर बह निकलता था उसका मुस्कुराना। जब-जब बादल क़स्बाई लड़की को छूकर गुज़रते, एक लकीर खींच जाती फ़रियाद की हथेली पर। देखो, ये आढ़ी लकीर असाढ़ की है और वो कातिक की। ये बीच में सहमा हुआ सा फागुन खड़ा है। फ़रियाद की नज़र रोज़ इन लकीरों को पढ़ती और इन लकीरों के सहारे क़स्बाई लड़की को…

पता नहीं क़स्बाई लड़की कभी कल्पना चावला या अमृता प्रीतम बनने के सपने देखती थी या नहीं, लेकिन फ़रियाद को पहले ही रोज़ से उसके वजूद में कल्पना चावला की उड़ान और अमृता की कविता घुली नज़र आई। नतीजा अनजान क़स्बे में हफ़्ता बीतते न बीतते, फ़रियाद मियाँ के ज़ेहन में उस क़स्बाई लड़की की आहटें गूँजने लगीं, जिसका उसे नाम तक मालूम नहीं था।

एक शाम जब वो ड्यूटी ख़त्म करके बड़ी हवेली की ओर जा रहा था, उसने देखा क़स्बाई लड़की सामने से आ रही है। सफ़ेद सलवार, सफ़ेद दुपट्टा और नीला कुर्ता। काले फीतों से बंधी लम्बी चोटियों को आगे-पीछे करती क़स्बाई लड़की फ़ाख्ता की चाल से चल रही थी। नज़दीक से देखने के लोभ में वह जहाँ था, वहीं खड़ा रह गया। दूरी हर पल कम होती जा रही थी। पहले टेंट वालों की दुकान पार हुई, फिर सुभाष जनरल स्टोर, फिर भैया जी चाट स्टॉल से होते-होते क़स्बाई लड़की उसके नज़दीक से गुज़र गई। इतने नज़दीक से कि लड़की के पैरों के नीचे धरती का दबना उसे साफ़ सुनाई दिया। हालांकि न कहीं सितार बजा और न फिज़ा में इतर की ख़ुशबू उड़ी, फिर भी उसका दिल बेभाव धड़क उठा और खून गर्म होकर तेजी से नसों में दौड़ने लगा।

जैसे-तैसे ख़ुद को समेटकर वो बड़ी हवेली की ओर मुड़ा, अचानक उसकी नज़र रास्ते से टकराई। आगे बढ़ती क़स्बाई लड़की के हाथ से सरककर कोई किताब जैसी चीज गिर गई थी। वो झपटकर आगे बढ़ा और देखा नीली जिल्द में लिपटी छोटी-सी डायरी रास्ते में पड़ी हुई थी। चोर नज़रों से आसपास देखते हुए उसने डायरी उठा ली। लगा जैसे मुठ्ठियों में डायरी नहीं क़स्बाई लड़की हो।

पीली कोठी तक पहुँचना भारी हो गया। हाथ-पैर ऐसे काँप रहे थे, जैसे वो किसी के घर में सेंध मारकर आया हो। फ़रियाद का मन दो हिस्सों में बंट गया था। एक कह रहा था, ‘डायरी को खोलना नहीं’, लेकिन दूसरा समझा रहा था, ‘सुनहरा मौक़ा है- क़स्बाई लड़की से जान-पहचान बढ़ाने का…’

टू बी ऑर नॉट टू बी के बीच झूलते हुए जब रात आधे आसमान तक चढ़ गई और क़स्बा नींद के साथ वफ़ादारी निभाने में मशग़ूल हो गया, तब एक अजीब-सी धुकधुकी के साथ आख़िर उसने डायरी खोल ही ली।

डायरी के शुरुआती पन्नों पर अलग-अलग शायरों की ग़ज़लें थीं और उसके बाद रोज़मर्रा की बातें। अचानक फ़रियाद की नज़र 13 अप्रैल की एंट्री पर अटक गई-

13 अप्रैल

“शिखा भाग गई… मुझे तो यकीन ही नहीं होता कि सचमुच शिखा भग्ग गई। कैसी तो सीदी-सादी थी। ज़्यादा फ़ैशन भी नहीं करती थी। पढ़ने में भी सई थी, फिर भाग कैसे गई? बेचारी उसकी बहन कैसे सिर झुकाए बैठी थी क्लास में… डोली तो उसी के साथ कॉलेज आती है, कह रही थी कि मम्मी ने साफ कह दिया अगर इस लड़की के साथ आती-जाती दिख गई तो टाँगें तोड़कर घर में बेठा दूँगी। वो मुझे भी समझा रही थी कि शिखा की बहन से बात मत करियो, बेकार हमारी भी बदनामी होगी… हम्म… सई है, कल मैं अपनी अंग्रेजी की कॉपी वापस ले लूँगी और फिर कुट्टी…”

वर्तनी की इतनी ग़लतियाँ एक-साथ देख फ़रियाद के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। इस वक़्त उसकी हालत उस शिकारी जैसी हो रही थी, जिसके मन में दया तो है, मगर वो शिकार का आनंद भी लेना चाहता है। घड़ी पर एक नज़र डालकर उसने आगे पढ़ना शुरू किया-

6 जुलाई

“आज ट्यूशन का पहला दिन था और आख़िरी भी… मैं डोली से पहले ही कह रही थी, ‘थोड़ा सोच लेते हैं।’ लेकिन नहीं… अपनी जल्दबाज़ी में ये लड़की कभी मेरी बात नहीं सुनती, मगर मुझे भी क्या ज़रूरत थी पुन्न की बछिया की तरह सुबह-सुबह जागकर उसके पीछे चले जाने की? बढ़िया होता मैं जाती ही ना… बेकार लदर-फदर तैयार हुई और वहाँ जाकर क्या देखते हैं कि सात बच्चों के बैच में बस हम दो लड़कियाँ, बाक़ी सब लड़के… वो भी सारे के सारे उजड्ड और उजबक… कैसे घूर रहे थे हमें, जैसे साबुत निगल जाएंगे। एक लड़के ने तो बेंच के नीचे से पैर बढ़ाकर डोली को छेड़ा भी। न भैया… कम नम्बर मंज़ूर हैं, पर ऐसी पढ़ाई डोली को मुबारक… वोइ बन जाए बेरिस्टरनी।”

11 नबंवर

“इतना गुस्सा आ रहा है न वीरेंदर पर… जी चाहता है एक ज़ोर का घूँसा मारूँ इसकी पीठ पे… आज फिर इसकी वजह से खामखा डाँट पड़ी। पहले तो हर जगह साथ में लटक जाएगा, फिर शिकात करेगा कि मैं दीदी के साथ इसकी सहेलियों के घर नहीं जाऊँगा, मैं बेकार बोर होता हूँ। ये लोग कोने में बैठकर फालतू की खुसर-पुसर करती हैं और मेरी पढ़ाई का नुकसान होता है (हुंह बड़ा आया पढ़ने वाला…) लेकिन ये मम्मी क्यों हर समय इतना डरी रहती हैं? हर बात पर घबराकर सवाल करेंगी। अगर थोड़ा ज़ोर से बोलो, तो कहेंगी ये अच्छी लड़कियों के लच्छन नहीं और जो हौले बोलें, तो शक करेंगी कि क्या खुसर-पुसर हो रही थी? कभी-कभी मन करता है, सबका बोलना बंद करवा दूँ और ज़ोर से गाती फिरूँ…”

फ़रियाद के मन में कुछ अटक रहा था, मगर उसने पढ़ना जारी रखा-

23 नबंवर

“पता नहीं आजकल क्यों इतना डर लगा रहता है? छत पर जाओ, कॉलेज, बाज़ार या कहीं और… एक जोड़ी आँखें हरदम मेरे आसपास मौजूद रहती है। कभी-कभी मन करता है उसके पास जाऊँ और कहूँ कि भाई मेरे हर समय क्यों घूरते रहते हो? कि जितना समय तुम घूरने में वेस्ट करते हो, उतनी देर में कोई अच्छा काम करो। अगर नहीं करना तो मत करो, लेकिन मुझे मत घूरो। मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता, बहुत गंदा-सा फील होता है। लेकिन नहीं कह पा रही न उससे और न किसी और से। लगता है मेरी ही गलती है, किसी से कहूँगी तो मुझे ही डाँट पड़ेगी। लेकिन अब सहना मुश्किल हो रहा है। आई… आई हेट देट पर्सन… आई हेट माई सेल्फ़… आई हेट एवरीबड़ी…”

न जाने क्यों फ़रियाद को लगा कि एकाएक रोशनी में जर्क आ गया। लगा जैसे क़स्बाई लड़की के साथ ग्यारह महीने, अट्ठारह दिन, सात घण्टे पुरानी पहचान ने राज़दारी का एक नया रंग ओढ़ लिया। आगे पढ़ने की उत्सुकता जाती रही, उसने गहरी साँस लेकर डायरी बंद कर दी और आँखें मूँद लीं। उस रात उसने सपने में क़स्बाई लड़की को देखा। सब्ज़ रंग की सलवार और सफ़ेद कुर्ता, हमेशा की तरह दो चोटियों की शक्ल में बंटे बाल और कलफ़दार दुपट्टा… वो अपने फ़ाख्ता क़दमों से चलकर उसके पास आई और अपनी पतली हथेली उसके सामने फैलाकर दी। मानो कह रही हो,

‘मेरी डायरी…’

फ़रियाद ने देखा उसकी हथेली इतनी गुलाबी थी कि जैसे अभी-अभी लाल बेल के बीज तोड़कर आई हो। उसका जी चाहा कि उन गुलाबी हाथों को एकबार अपनी पलकों से लगा लूँ, लेकिन उसने ख़ामोशी से उनके बीच नीली डायरी रख दी और आँख खुल गई।

खिड़की से आती चिड़ियों की चहचहाहट बता रही थी कि भोर हो चुकी है। नुक्कड़ की मस्जिद में फ़जर की अज़ान हो रही थी। फ़रियाद का पूरा बदन पसीने से भीग गया, मानो उसे चोरी करते पकड़ लिया गया हो। उसे याद आ रहा था कि पिछले दिनों जब उसकी फेवरेट टी-शर्ट गुम गई थी, तो कैसे उसका दम निकल गया था। फिर उसके पास तो किसी की पर्सनल डायरी थी। किसी का बेहद निजी पल।

‘ओह ये मैंने क्या किया? क्यों उठा लाया उसकी डायरी, यूँ चुपके से? कितना परेशान हो रही होगी वो! नहीं ये सही नहीं!’ उसने फ़ौरन ख़ुद से वादा किया कि मौक़ा मिलते ही मैं ये डायरी लौटा दूँगा, लेकिन हज़ार आँखों वाले इस क़स्बे में एक शहरी लड़के के लिए एक क़स्बाई लड़की से मिलने का मौक़ा ढूँढ पाना भी कहाँ आसान था!

फ़रियाद की समझ नहीं आ रहा था कि वो करे तो क्या करे? एक ओर नीली डायरी किसी बोझ की तरह उसके सीने पर रखी हुई थी, तो दूसरी ओर सपने ने उसकी पूरी दुनिया उलट-पुलट कर दी थी। उसने किसी को नहीं बताया मगर उस दिन उसे धरती आसमानी नज़र आई और आसमान मटमैला। कभी लगता कि हर बात पहले जैसी है, लेकिन अगले ही पल अहसास होता कि पहले जैसा कुछ भी नहीं। धूप पहले से ज़्यादा कड़ी है। फूलों के रंग पहले से ज़्यादा चटख, हवा पहले से ज़्यादा तेज़, टिटहरी की आवाज़ पहले से ज़्यादा तीखी और वो मोड़ (जहाँ से क़स्बाई लड़की रोज गुज़रती थी) पहले से ज़्यादा गहरा।

फ़रियाद एक बात अच्छी तरह जानता था कि ख़यालों में वो भले कितनी ही दूर तक भाग ले, मगर हक़ीक़त के फ़ासलों को तय करना बहुत कठिन है। अभी तो उसका अपना शहर भी इतना नहीं खुला कि किसी लड़की से सीधे जाकर बात की जा सके। तिसपर ये तो अभी-अभी गाँव के खोल से निकला क़स्बा था।

‘तो क्या उसकी प्रेम कहानी भी अधूरी दम तोड़ देगी?’ फ़रियाद सोचता तो सिहर जाता। जिस डायरी को वह क़स्बाई लड़की से मेल-जोल बढ़ाने की राह समझकर उठा लाया था, धीरे-धीरे वो उसके लिए धिक्कार बनती जा रही थी। तक़रीबन रोज़ ही सपने में क़स्बाई लड़की दिखती। कभी वो उसे सवालिया निगाहों से घूर रही होती। मानो पूछ रही हो कि ‘क्या यही हैं शहरी संस्कार…?’ और कभी बेचैन होकर यहाँ-वहाँ अपनी डायरी ढूँढ रही होती।

कई बार फ़रियाद को लगता कि वो इस मसले पर कुछ ज़्यादा ही सेंटी हो रहा है। किसी की डायरी का किसी के पास आ जाना, कोई इतनी बड़ी बात भी नहीं, न उसमें ऐसा कोई बड़ा राज़ ही लिखा हुआ है। लेकिन फिर भी उस दिन के बाद से हर वक़्त एक कशमकश उसके भीतर जारी रहने लगी थी। माने वो जब जाग रहा होता, तब भी जैसे ख़्वाब में होता। यूँ दुआओं में उसे कभी भरोसा नहीं रहा, लेकिन इस बीच उसने अनजाने दुआएँ पढ़नी शुरू कर दी थीं कि कौन जाने किस दुआ का असर मुलाक़ात का रास्ता खोल दे।

फ़रियाद अभी इसी उधेड़बुन में था कि क़स्बाई लड़की से मिलने की राह कैसे निकले कि अचानक शहर से बुलावा आ गया। अब भाई सगी फूफी शादी की पचासवीं सालगिरह मना रही हों और भतीजा शामिल न हो, ऐसा भी कहीं होता है भला! फ़रियाद का वश चलता, तो बिल्कुल भी न जाता। क्योंकि उसे मालूम था कि वहाँ एनीवर्सरी कम मनाई जाएगी, रूठने-मनाने, सवाल-जवाब और जिरहबाज़ियों के दौर ज़्यादा होंगे। फिर भी उसे जाना पड़ा। अम्मी ने क़सम जो दी थी, लेकिन वो सोचकर गया था तीन दिन से ज़्यादा नहीं रुकेगा और उसने यही किया भी। मगर जिन सावन-सावन आँखों के लिए वो यूँ भागा आया था, वे कहीं थीं? न छत पर, न नुक्कड़ वाले मोड़ पर, न कॉलेज जाती लड़कियों की भीड़ में और न अपने घर के सामने वाले बगीचे में…

फ़रियाद को अजीब लगा। चिंता हुई। उल्टे-सीधे कयास भी लगाए और ख़ुद को ये कहकर समझाने की कोशिश भी की कि ‘कोई नहीं… हो सकता है कहीं बाहर गई हो, आ जाएगी एक-दो दिन में…’

लेकिन बात की बात में कई दिन बीत गए, पर क़स्बाई लड़की की झलक न मिली। अब ये तो बड़ा सवाल हुआ। न सुराग मिलता, न सब्र होता। कहने को हर दुनिया वही थी, लेकिन एक क़स्बाई लड़की की गुमशुदगी ने उसे बेरंग और बेरौनक़ बना दिया था। उस पर पिछले एक हफ़्ते से लगातार हो रही बारिश ने रही सही कसर पूरी कर दी। जाने कैसा पानी-पानी मौसम था ये कि बादलों के खुलने की दुआएँ करते दिन बीत जाता, लेकिन न बूँदें थमती और न हवा का शोर।

हालांकि बारिश से पेड़ ताज़ादम हो चले थे और सड़कें धुली-धुली। चिड़ियों का एक झुण्ड बार-बार ज़मीन पर उतरता, फिर डाल पर जाकर बैठ जाता। जैसे उन्होंने इसी को अपना खेल बना लिया था। पूरा आलम उनकी आवाज़ों से नहाया हुआ था, पर फ़रियाद का अपना मन…. कई बार उसको लगता कि जैसे ये बारिश नहीं उसी की बेचैनी है, जो बादलों की ओट लेकर धरती पर बरस रही है। सच जब चारों तरफ़ ख़ुशनुमा मौसम हो, तब बेचैन होना कितनी बेचैनी भरा होता है, ये केवल वही जान सकता है जिसका दिल दफ़अतन कहीं गिर गया हो।

इसीलिए इतवार की सुबह जैसे ही बारिश रुकी, फ़रियाद ने पैरों में चप्पल डाली और बगैर किसी ख़ास मक़सद के क़स्बे की गलियाँ नापने लगा। बारिश की वज़ह से ज़्यादातर दुकानें बंद थीं। गलियों में पानी भरा हुआ था। सड़कों को गुलज़ार किए रहने वाले बच्चे भी इक्का-दुक्का ही दिखाई दे रहे थे। बाक़ी शायद बरसाती बीमारियों के डर से घरों में क़ैद कर लिए गए थे। फ़रियाद ने मुसकुराना चाहा, लेकिन उसके घर की ओर देखकर दिल में अजब-सी कसक सी उठी और वो रास्ता बदलकर पुरानी तहसील की ओर मुड़ गया। बेशक उसे पता नहीं था कि वो वहाँ क्यों जा रहा था, लेकिन उस पल उसके मन की जो हालत थी, वो दूर तक यूँ ही चलते रहना चाहता था। बेगरज़, बेमक़सद…

अचानक… जैसे उसके उम्र भर की दुआएँ एक साथ कुबुल हो गईं। सामने से वही चेहरा चला आ रहा था, जिसे एक नज़र देखने के लिए उसकी आँखें न जाने कब से तड़प रही थीं। आह वो धुला-धुला रंग और सावन-सावन आँखें…

वो शायद अपनी किसी सहेली के घर से जा रही थी या हो सकता है कि लौट रही हो क्योंकि इतवार के दिन हाथ में किताबें लिए उसके कहीं और जाने का सवाल ही नहीं था… फ़रियाद ने सोचा। न जाने क्यों उसे महसूस हुआ कि क़स्बाई लड़की की आँखों में उसे गली के दूसरे छोर पर खड़ा देख एक चमक उभरी, लेकिन अगले ही पल उसकी जगह संकोच ने ले ली।

उसने मन में एक साथ एक साथ कई फिल्मी-दृश्य कौंध गए, लेकिन वो अपनी ज़िंदगी की कहानी को किसी बासी फिल्म की स्क्रिप्ट से रिप्लेस नहीं करना चाहता था। वह मुस्कुरा दिया और दीवार से पुश्त टिकाकर खड़ा हो गया। उसे रह-रहकर वह दिन याद आ रहा था, जब वो इसी तरह उसके नज़दीक से गुज़री थी अपनी नीली डायरी छोड़कर।

हालांकि संकोच से घिरी क़स्बाई लड़की आज भी इतने धीमे-धीमे आगे बढ़ रही थी। मानो पाँव ख़ाली हों और रास्ता अंगार… लेकिन क़स्बों की गलियाँ होती ही कितनी लम्बी हैं! फ़रियाद उसके नज़दीक आने का इंतज़ार करने लगा। और जब वो इतने पास आ गई कि उससे बात करने के लिए आवाज़ ऊँची न करनी पड़े, फ़रियाद ने कहा-

“मुझे ग़लत मत समझिएगा मोहतरमा… मेरा नाम फ़रियाद है और मैं यहाँ केवल यह कहने के लिए रुका हुआ हूँ कि आपकी डायरी… वही जिस पर नीली जिल्द चढ़ी है… वो मेरे पास है और महफ़ूज़ है। मैं कई दिन से यही बताने का मौक़ा तलाश रहा था, मगर कभी आप नहीं थीं और कभी मैं… लेकिन ख़ैर क्या आप कल इसी वक़्त, यहीं आ सकती हैं? मैं आपकी डायरी लेता आऊँगा।”

क़स्बाई लड़की ने सिर हिलाकर हामी भरी और ख़ामोश क़दमों से आगे बढ़ गई। फ़रियाद ने एक गहरी साँस ली और फ़ाख्ता क़दमों का दूर जाना सुनने लगा। चार क़दम चलने के बाद यकायक वो पलटी और बोली-

“नहीं… उसे लौटने की ज़रूरत नहीं। अब्बा मेरा निकाह पढ़वाने की जल्दी में हैं। हद से हद चार या छह महीने… उसके बाद वो डायरी या तो किसी दुछत्ती के अंधेरों में पड़ी घुटा करेगी या रद्दी में बिक जाएगी। आपके पास रही, तो हो सकता है उस डायरी में क़ैद एक क़स्बाई लड़की साँस लेती रहे…”

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