सारिका पारीक की कविताएँ

मुक्ति

तीर्थों में
प्रायश्चित
कितनी मात्रा में सम्भव है?
जीवनपर्यन्त किए गए समुच्चय
पापों से मुक्ति
इतने सस्ते दामों पर सुलभ है?
समस्त पापों का समावेश कर
पवित्र नदियों में
निर्वासन कर देना
अपराध सहस्राणि…
कुकर्मों पर इतनी
भारी छूट
साधु…
लेकिन उन पहाड़ों
नदियों और धामों के
स्थानीय रहवासियों
को कहाँ जाना होगा?
उनकी मुक्ति?

सत्य, धर्म, मर्यादा

तख़्त पर बिखरी चौपड़
छोटे वर्गाकार नुमा
डिब्बों में
गुलाम सरीखे प्यादे
सम्मुख बैठे मालिक
को अपना सम्पूर्ण
अस्तित्व समर्पित कर
निर्भर हैं
उसके हाथों की
आठ कच्ची कौड़ियों
के खेल पर
खेल छल-कपट का
साम, दाम, दंड, भेद
गिरकर
गिराकर
जीत लेगा
निरीह बेजान प्यादों को
जो बेखबर हैं
उनकी बाज़ी
कोई खेल गया
प्रेम से
प्रेम के लिए
हर धूर्तता पर
अपनी कुटिलता
का ठप्पा लगा
सिद्धहस्त शकुनि
की पुतलियों
के इशारे पर नाचते पासे
जितनी बार फेंकेगा
जीतता चला जायेगा
हर बार एक नई चौसर
मूक मूर्तिवत खड़े रह जाएँगे
सत्य, धर्म, मान और मर्यादा।

चिर वेदना के सुर क्यों इतने प्रबल हैं

चिर वेदना के सुर
क्यों इतने प्रबल हैं?
अश्रुओं
को मुखवास जानकर
हर पीड़ को
यामिनी मानकर
जुगनुओं के दीप हाथों पर
कितने जलाए
अपने ही
अस्तित्व की
प्रत्यंचा चढ़ा
तीर सारे मैंने
खुद पर ही चलाए
प्रारब्ध की बेदी पर
अपनी रेखाओं की
चीड़ सी जलती अग्नि पर
कितने सच्चे
और झूठे रिश्ते निभाए
अब जो शेष है
उसे महेश मानकर
छिपा लिया
एक स्वप्न को
मौन होठों को दबाए
सतत सज्ज हूँ
हृदय से अंगीकार करने
रिक्त को रिक्तता
का कोई बोध कराए
एक असाध्य प्रश्न
जो अबूझ है
चिर वेदना के सुर
क्यों इतने प्रबल हैं?

शैव योगी

विस्मयादिबोधक चिह्नों
के अतिरिक्त
उन महाकाव्यों के लिए
भिक्षुक सिद्ध हुई
अंजुरियों पर
रखने योग्य
अपनी शब्दावली से
न संशोधन उपलब्ध था
न ही कोई साध्यता
निःशब्द जड़ बन
ताक रही थी
शैव योगी के
श्वेत पाषाण से
तरल चक्षु
के यथार्थ
अबोध प्रश्नों को
जो यकायक जा चुका था
ऋणी बनाकर
अनंत शुभकामनाओं के साथ।

अपूर्ण से पूर्ण की ओर

शीर्ण शिलाखण्ड के
प्रत्येक कोर पर
अलभ्य
जीर्ण लिपि में
लिखें कुछ धुंधले
घिसे शब्द
चुनवाए क्रॉस पर
जमी हुई
खून की मीठी पपड़ी
के माफ़िक
कोई दंत कथा नहीं
शायद किसी की
मौलिक व्यथा हो…
या…
अधूरी जीवंत अभिलाषाएँ
जो फिर किसी जन्म में
शायद सज्ज होंगी
प्रमाणिकता के साथ
अपूर्ण से पूर्ण की ओर।

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