मेरे संचित प्रेम-फल को चखते समय
कुछ अंश गिरा दिए थे तुम्हारे अस्थिर हाथों ने,
गिरे हुए ये अंश पोषित हुए मेरे भीतर
और मन की नमी पा परिवर्तित हुए पुष्ट बीजों में,
इन स्मृति-बीजों को रोप दिया था मैंने
अन्तःस्थल की उर्वर भूमि में

समय के साथ अँकुराए नन्हे बीज
और पौधे बन मुस्करा उठे मन के कोने में
लहलहा उठे यादों के पौधे

एक सुबह देखा मैंने
स्मृति-पौधे पर खिला था सुर्ख़ गुलाब
मेरी आँखों के तृप्त होने से पहले ही
आगे बढ़ तोड़ लिया था तुमने उसे
पहरेदार काँटों से बचते-बचाते

मैं अब तक सहेज रही हूँ उन काँटों को
काँटों की तीक्ष्ण नोकों से क्षत हुई उँगलियाँ
सहला रही हैं काँटों के घाव
मौन है, विदीर्ण हुआ उँगलियों का हृदय
आशान्वित हैं उँगलियों की आँखें
रोज़ सींचती हैं स्मृति-पौधे को
वे प्रतीक्षारत हैं…
पौधे के पुनः पुष्पित होने तक।

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