‘Striyon Chalo Kahin Aur Chalein’, a poem by Rupam Mishra

ये शयनकक्ष से संसद तक काँटेदार हँकना लेकर खड़े हैं
जो हमारे ज़रा से इंकार पर हमारी आत्मा पर पड़ेगा

स्त्रियों, चलो कहीं और चलें
यह उनकी दुनिया है, उनके बनाए हुए नियम हैं
जिसमें उन्होंने स्त्रियों को मनुष्य न मानकर
ज़र, ज़मीन में जोरू जोड़कर सम्पत्ति की संज्ञा दी

हम स्त्रियाँ इस पर इठलाती फिरीं कि हम पुरुष की सम्पत्ति हैं

तुम आज़ादी ओढ़ने शहर की ओर चली थीं ना
हम सभ्यता का अलाप सुनकर रोमांचित थे
उसके अन्तरे पर आकर ठगे-से उदास खड़े हैं

मुझे देश के सारे शहर एक जैसे लगे जिनकी दीवारें नपुंसकता के इलाज की गारण्टी से पटी थीं
और अख़बार बलात्कार की घटनाओं से पटे थे

ये इश्तिहार और अख़बार देखकर मुझे क़स्बे में ग़रीब के आहाते में कूदा हुआ वो व्यक्ति याद आया
जिसने पकड़े जाने पर बेहयाई से कहा कि मुझे तो इसकी बेटी ने बुलाया था

हम किसी उदार पंथ की ओर मुँह उठाए
कब तक खड़े रहेंगे
क्योंकि हर पंथ में एक पंथ खड़ा है- पुरुष पंथ
जिसका स्त्रियों को लेकर अपना दण्ड-विधान है

तुम सारी विसंगति को त्यागकर प्रेम चुनना चाहती हो
तो जान लो
इस युग में सबसे कठिन है पुरुष को प्रेम होना
और भयावह है स्त्री को अनायास मोह होना।

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