सुनो तानाशाह!
एक दिन चला जाऊँगा
एक नियत दिन
जो कई वर्षों से मेरी प्रतीक्षा में बैठा है

मेरी जिजीविषा का एक दिन
जिसका मुझे इल्म तक नहीं है—
क्या वह दिन आज है
या फिर कल का दिन

आज जब उजड़ रही हैं बस्तियाँ
बन रहे हैं नए रेगिस्तान
जहाँ जलने थे चूल्हे
जल रहे हैं साबुत घर

ईंटों पर पके माँस की गंध
तुम्हारी अलमारियों में क़ैद है
उछाली हुई दस्तारों पर
चढ़ाकर मर्यादाहीन जूते
बड़ी-बड़ी बातें हाँक जाते हो तुम

सुनो तानाशाह!
अशान्ति के कटिबद्ध श्रमदूत!
तुम्हारी चोचलेबाज़ी
नहीं समझता भूख का दिमाग़

जिस प्रतिबद्धता से लौट आए थे
फटे बेवायों वाले पैर
अपनी ज़मीनों पर
शहर की अधमरी लाशें ढोए
लौट जाएँगे संसद की तरफ़
वहीं फूकेंगे मरी हुई न्यायिकाओं की
फेंकी हुई हड्डियाँ

सुनो तानाशाह!
तुम्हारे कैननों में जो पानी है
वही माँगने आते हैं
खलिहानों के लोग
उनकी देह के बदले
उनके खेतों तक
पानी पहुँचा सकते हो तुम

एक सूरज ढलता है तो
एक सूरज उगता भी है

जाऊँगा!
मगर ढलते सूरज की
जयकार लगाता जाऊँगा

जाऊँगा!
मगर उगते सूरज की
ललकार उठाता जाऊँगा

मेरे आसपास के लोग
न ही राजनीति की कुटिलता जानते हैं
न ही युद्ध कौशल
जानते हैं सिर नवाने की कृतज्ञता
और पेंचीली प्रत्याशाओं में डूबकर
जीते चले जाने का हुनर

सुनो तानाशाह!
तुम्हारी मूँछों का ताव
और तनी भौहों की चालाकी
बख़ूबी समझती हैं
साधनहीन साधारण सन्ततियाँ

ये रेगिस्तान रहेंगे
इन रेगिस्तानों की औलादें याद रखेंगी
आपदाओं में अवसर जैसे त्रासद शब्द
ये जले हुए मकान भी रहेंगे
ये फूटे हुए चूल्हे भी रहेंगे
सारा का सारा उजाड़ सलामत रहेगा
सरकारी जागीरदारी से बाहर

सुनो तानाशाह!
मेरा जाना तय है
ठीक उसी तरह जैसे तुम्हारा

लेकिन मैंने सुना है कि
दुनिया के सारे तानाशाह
एकान्त की पीड़ा से मरते हैं
मुझे दया आती है तुम पर कि
तुमने ऐसी मृत्यु चुनी है।

आदर्श भूषण की कविता 'कौन स्तब्ध है'

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आदर्श भूषण
आदर्श भूषण दिल्ली यूनिवर्सिटी से गणित से एम. एस. सी. कर रहे हैं। कविताएँ लिखते हैं और हिन्दी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है।

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