तावीज़

‘Taaweez’, Hindi Kavita by Ruchi

औरतों ने पतियों को तावीज़ की तरह जाना,
हर मुसीबत का हल पतियों का साथ रहना माना।
गाढ़ी परिस्थितियों से उबरने के बाद तावीज़ को,
दोनों आँखों से लगा चूमतीं।
और जिन मुश्किलों का पार न पायें तो गले में बंधे,
तावीज़ को हौले से टटोलतीं।
हौसलों को बुलन्द पातीं बस संग रहना चाहिए भतार,
भले नील पड़ी पीठ पर हल्दी-चूना भी न थोप सके,
पर मन को ढाढ़स यही दिलाती कि ‘मरद साथ है’

जब होश में होतीं तो
हिसाब लगातीं पाये हुये दुःख दर्द का,
हासिल क्या हुआ सोचतीं तो घाटा ही हिस्से आता,
फिर भी माँग का सिंदूर हमेशा मुनाफ़े सा भाता।
आदमी ही वो खूँटा है जिससे बंधकर,
आवारा पशु सी न होगी ज़िन्दगी।
माँ-बाप से पति का घर इतना ही क्षेत्र,
आवंटित होता साधिकार चरने के लिए,
और चर जाती हैं ये, तमाम सुख दुःख, मलाल।

वफ़ादारी से याद रखती हैं, पति की चुमकार,
कब बुख़ार की तपन में पानी का गिलास पकड़ाया था,
छोटी बहन के ब्याह में मायके में पाँव टिकाया था,
बीमार बाप को शहर ला अस्पताल दिखाया था,
इन तमाम बातों को कस कर निचोड़,
निकाल लेती हैं ज़िन्दगी बिताने भर का स्नेह।
यक़ीं करती हैं पति के गूलर के फूल से प्रेम पर,
और स्वाति नक्षत्र की ओस की बूँद सा स्नेह,
संजो लेना चाहती हैं, सीप से मोती होने को।

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