Tag: विभाजन
अमृतसर आ गया है
"उसने ध्यान से अपने कपड़ों की ओर देखा, अपने दोनों हाथों की ओर देखा, फिर एक-एक करके अपने दोनों हाथों को नाक के पास ले जा कर उन्हें सूँघा, मानो जानना चाहता हो कि उसके हाथों से खून की बू तो नहीं आ रही है।"
आख़िरी तिनका
पतझड़ के दिन थे। नई फसल की बोआई शुरू हो चुकी थी। मुर्गे की पहली बाँग ने चन्दन की आँख खोल दी। वैसे भी...
मेरी माँ कहाँ
दिन के बाद उसने चाँद-सितारे देखे हैं। अब तक वह कहाँ था? नीचे, नीचे, शायद बहुत नीचे... जहाँ की खाई इनसान के खून से...
वह मर्द थी
"छिः छिः, कितनी गन्दी औरत है यह जो रोटियाँ बेल रही है। अगर औरत है तो। और मुझे शादीलाल आदमी अच्छा नहीं लगा। अपने होटल में एक तो औरत रखता है और फिर इतनी गन्दी... अरे, ये होते ही ऐसे हैं। शायद ये औरत भी इस होटल की एक तरकारी हो।"
पार्टीशन
"आप क्या खाक हिस्ट्री पढ़ाते हैं? कह रहे हैं पार्टीशन हुआ था! हुआ था नहीं, हो रहा है, जारी है..."
जायज़ इस्तेमाल
दस राउंड चलाने और तीन आदमियों को ज़ख़्मी करने के बाद पठान भी आख़िर सुर्ख़रु हो ही गया।
एक अफ़रा तफ़री मची थी। लोग...
अपने आँगन से दूर
विभाजन के बाद जिन शरणार्थियों का जहाँ दाव लगा, उन्होंने उन घरों और वस्तुओं पर अधिकार कर लिया, और यह सरहद के दोनों तरफ हुआ! ऐसे में आलिया को क्या पता कि उसके मामू उसे किन के घर ले आए हैं और यह जो मूर्ति रखी है, जिसके आसपास फूल पड़े हैं और एक पीला डोरा लटक रहा है, यह कोई ख़ास मूर्ति है या सिर्फ एक खिलौना!
निगरानी में
सहम कर ब ने पूछा, "कोई और ख़बर..."
जवाब मिला, "ख़ास नहीं... नहर में तीन कुत्तियों की लाशें मिलीं।"
अ ने ब की ख़ातिर मिल्ट्री वालों से कहा, "मिल्ट्री कुछ इंतिज़ाम नहीं करती।"
जवाब मिल, "क्यूँ नहीं... सब काम उसी की निगरानी में होता है।"
पठानिस्तान
क्योंकि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान पर्याप्त नहीं थे...!
शरणदाता
"देखो, बेटा, तुम मेरे मेहमान, मैं शेख साहब का, है न? वे मेरे साथ जो करना चाहते हैं, वही मैं तुम्हारे साथ करना चाहता हूँ। चाहता नहीं हूँ, पर करने जा रहा हूँ। वे भी चाहते हैं कि नहीं, पता नहीं, यही तो जानना है। इसीलिए तो मैं तुम्हारे साथ वह करना चाहता हूँ जो मेरे साथ वे पता नहीं चाहते हैं कि नहीं... "
विभाजन की एक और कहानी, जो बताती है कि जब दो सम्प्रदायों की सदियों पुरानी एकता और भाईचारे पर एक 'मंशा' के साथ चोट की जाती है तो ऊपर से दिखने वाला सौहार्द भी ज़्यादा दूरी तक नहीं टिक पाता... कभी मज़बूरी के चलते और कभी बस समय के फेर में!
पेश-बंदी
नई रात, नई जगह, नई वारदात.. और कहानी? वही पुरानी!!
#Manto #Partition
तक़्सीम
"इस सन्दूक के माल में से मुझे कितना मिलेगा।”
सन्दूक पर पहली नज़र डालने वाले ने जवाब दिया, “एक चौथाई।”
“बहुत कम है।”
“कम बिल्कुल नहीं, ज़्यादा है.. इसलिए कि सबसे पहले मैंने ही इस पर हाथ डाला था।”
“ठीक है, लेकिन यहाँ तक इस कमर तोड़ बोझ को उठा के लाया कौन है?”
“आधे आधे पर राज़ी होते हो?”
“ठीक है… खोलो सन्दूक।”







