Tag: विभाजन
वारिस शाह से
"पंजाब की एक बेटी रोई थी
तूने एक लम्बी दास्तान लिखी
आज लाखों बेटियाँ रो रही हैं..."
वारिस शाह ने 'हीर' लिखी थी, पंजाब की एक बेटी के लिए.. इस कविता में अमृता प्रीतम दुहाई दे रही हैं कि विभाजन के समय आज पंजाब की कितनी बेटियों को अत्याचार सहना पड़ रहा है.. वे रोने पर विवश हैं.. कई परिवार से अलग हो गईं, कितनों को परिवार ने मिल जाने पर भी नहीं अपनाया। इतना कुछ हो रहा है आज पंजाब की हीरों के साथ.. तो आज वारिस शाह अपनी कब्र में चुप क्यों हैं?
तआवुन
विभाजन ऐसा दौर रहा है जिसमें हर तरह की लूट-खसूट हुई, इंसान ने ख़ुद को इंसान न कहलाए जाने के सारे कारण पैदा किए.. लेकिन साथ ही इस दौर में इंसानियत का वह चेहरा भी देखने को मिला जिसका अंदाज़ा शायद उन इंसानों को भी नहीं था जो उसका माध्यम बने! पढ़िए कहानी एक ऐसे आदमी की, जो एक घर की लूट के दौरान लोगों से यह अपील कर रहा है कि वे सब तआवुन से, सहयोग से काम लें.. और बिना तोड़-फोड़ इस घर को लूटें.. कौन था वह आदमी?
कस्रे-नफ्सी
एक तरफ तलवार और गोलियाँ, दूसरी तरफ दूध और हलवा.. लोगों की खिदमत करने के तरीके भी विभाजित हुए थे एक दौर में...
मुनासिब कार्रवाई
"हम दोनों अपना आप तुम्हारे हवाले करते हैं... हमें मार डालो।"
"हमारे धरम में तो जीव-हत्या पाप है..।"
हलाल और झटका
"इसको हलाल क्यों किया?"
"मजा आता है इस तरह..।"
साम्यवाद
लूट या साम्यवाद?
सफाई पसंद
गाड़ी रुकी हुई थी।
तीन बंदूकची एक डिब्बे के पास आए। खिड़कियों में से अंदर झाँककर उन्होंने मुसाफिरों से पूछा- "क्यों जनाब, कोई मुर्गा है?"
एक...
हैवानियत
अपनी जान बचाने के लिए, अपने परिवार के किसी सदस्य की जान जोखिम में डालने की विवशता इस संसार के सबसे बड़े दुखों में से एक होगा.. और यह दुःख विभाजन ने जाने कितने लोगों को दिखाया...
बँटवारा
बँटवारे के दौरान केवल देश का नहीं, लोगों और उनके सामान का भी जमकर बँटवारा हुआ.. इस कहानी में भी लूट का एक संदूक बँटवारे का कारण बना! बँटवारा किसका? यह पढ़िए कहानी में!
‘सॉरी’ व ‘रियायत’
सॉरी
छुरी पेट चाक करती हुई नाफ के नीचे तक चली गई।
इजारबंद कट गया।
छुरी मारने वाले के मुँह से पश्चात्ताप के साथ निकला- "च् च्...
किसका इतिहास
"...कौम कौन-सी चिड़िया का नाम है?... वह नाम लड़ने के लिए होता है- कौम का नाम।... सहने के लिए होता है आदमी- निपट नंगा, बेबस आदमी..."
असली बात
विभाजन, फिर से एक और कहानी प्रस्तुत है इसी विषय पर.. भारतीय साहित्यकारों ने मुश्किल ही इस त्रासदी का कोई भी पहलू अनछुआ छोड़ा होगा.. उन दिनों में जब दंगे हुआ करते थे तो उससे बचने के लिए कर्फ्यू लगा दिया जाता था, लेकिन वो कर्फ्यू केवल कहीं आने-जाने पर प्रतिबन्ध न होकर, खाने-पीने और जीने तक पर एक रोक के रूप में उभर कर आता था, खास तौर से उनके लिए जो रोज़ कमाने-खाने वाले हों.. ऐसे में उन दो वर्गों ने जहाँ-जहाँ नफरत भूलकर सोहार्द को नहीं अपनाया, वहां केवल नुकसान ही हुआ.. जान और माल दोनों का!
पढ़िए नासिरा शर्मा की यह कहानी 'असली बात'!




