Tag: राजनीति
सियासत
'Siyasat', a poem by Shekhar Azamgarhi
वादों की सिगरेट जलाकर
बहुमत का धुआँ उड़ा
मुद्दों की राख उड़ाता चला
नफ़रत के निकोटिन का आदी
फेफड़े में झूठ जैसे क्षयरोग
खाँसता,...
अम्बिकेश कुमार की कविताएँ
Poems: Ambikesh Kumar
विकल्प
उसने खाना माँगा
उसे थमा दिया गया मानवविकास सूचकाँक
उसने छत माँगी हज़ारों चुप्पियों के बाद
उसे दिया गया एक पूरा लम्बा भाषण
उसने वस्त्र माँगा मेहनताना
उसे...
सब जैसा का तैसा
कुछ भी बदला नहीं फ़लाने!
सब जैसा का तैसा है
सब कुछ पूछो, यह मत पूछो
आम आदमी कैसा है?
क्या सचिवालय, क्या न्यायालय
सबका वही रवैया है,
बाबू बड़ा...
देश
'Desh', Hindi Kavita by Vijay Rahi
देश एल्यूमीनियम की पुरानी घिसी एक देकची है
जो पुश्तैनी घर के भाई-बँटवारे में आयी।
लोकतंत्र चूल्हा है श्मशान की काली...
कब्ज़ा
'Kabza', a poem by Amandeep Gujral
दृश्य 1
एक निर्जन-सा चौराहा
बड़ा सा पेड़
साँय-साँय करती हवा
इक्का-दुक्का गाड़ियाँ
मुट्ठी भर लोग
दृश्य 2
एक छोटा-सा चौकोर पत्थर
लाल-काली रेखाएँ
थोड़ी-सी अगरबत्तियाँ और एक...
टूटता तिलिस्म
'Tootata Tilism', a poem by Pranjal Rai
संवादों के दौरान अक्सर अधूरे रह जाते हैं कुछ प्रश्न,
कि प्रश्नों का अधूरा रह जाना
कितना ज़रूरी है एक...
कभी-कभी
कभी-कभी इस प्रांगण में
गांधी की 'एकला चलोरे' वाली लाठी की
ठकठक सुनाई पड़ती है,
किन्तु जब कान यथार्थ को परखते हैं तो
लगता है कि महान नेता...
पैदल आदमी
जब सीमा के इस पार पड़ी थीं लाशें
तब सीमा के उस पार पड़ी थीं लाशें
सिकुड़ी ठिठरी नंगी अनजानी लाशें
वे उधर से इधर आ करके...
मैं जानता हूँ
मैं उस किसान को जानता हूँ
जिसके खेत में इतनी कपास होती है
कि रेशे से जिसके, फांसी का फंदा बनता है।
मैं उस लुहार को जानता...
शासन की बंदूक
खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
जिसमें कानी हो गई शासन...
तब के नेता, अब के नेता
तब के नेता जन-हितकारी,
अब के नेता पदवीधारी।
तब के नेता किए कमाल,
अब के नित पहने जयमाल।
तब के नेता पटकावाले,
अब के नेता लटका वाले।
तब के नेता...
सिर पर आग
सिर पर आग
पीठ पर पर्वत
पाँव में जूते काठ के
क्या कहने इस ठाठ के।
यह तस्वीर
नई है भाई
आज़ादी के बाद की
जितनी क़ीमत
खेत की कल थी
उतनी क़ीमत
खाद...









