Tag: Pranjal Rai
पुल की आत्मकथा
'Pul Ki Aatmakatha', a poem by Pranjal Rai
मेरी देह पर देखो कितने पैरों के निशान हैं!
जो गुज़रे मेरी पीठ पर चलते हुए,
वे अगली सदी...
विस्थापन के अंतरावकाश में
'Visthapan Ke Antaravkash Mein', a poem by Pranjal Rai
एक ख़ानाबदोश की अन्तहीन यात्रा-सी
ठौर दर ठौर
सरकती है ज़िंदगी
कि कुछ यात्राओं में
पिछले क़दम की थकान ही
अगले...
टूटता तिलिस्म
'Tootata Tilism', a poem by Pranjal Rai
संवादों के दौरान अक्सर अधूरे रह जाते हैं कुछ प्रश्न,
कि प्रश्नों का अधूरा रह जाना
कितना ज़रूरी है एक...
प्रक्रिया
'Prakriya', Hindi poem by Pranjal Rai
ठोकर खाकर गिरा एक बच्चा,
किन्तु धूल झाड़ते हुए जो उठा
वह एक समझदार आदमी था।
इस बार वह और ज़्यादा ताक़त...
अन्वीक्षण
मुझे तुम्हारे चेहरे से
किसी भीगी किताब की गंध आती है-
और लगता है अक्सर
कि जीवन के अधिकतर सवालों के सामने
हम एक ही कक्षा के विद्यार्थी...
गिरना एक पुल का
'Girna Ek Pul Ka', a poem by Pranjal Rai
हमारे समय की देह पर
सबसे गहरे रंग में
सबसे गाढ़े अक्षरों में लिखा है - 'पतन',
जहाँ सारी...





