Tag: religion

God, Abstract Human

तारबंदी

जालियों के छेद इतने बड़े तो हों ही कि एक ओर की ज़मीन में उगी घास का दूसरा सिरा छेद से पार होकर साँस ले सके दूजी हवा में तारों की इतनी...
God, Abstract Human

विस्थापित ईश्वर

जो घटना समझ नहीं आयी, उसे हमने ईश्वर माना और उनसे ईश्वर रचे जो समझ के अधीन हुईं। उसने वर्षा, हवा, पेड़ों में शक्ल पायी, और सीधे सम्बन्ध...
Posham Pa

विषय

बन्द गिरजों, वीरान मस्जिदों और सुनसान शिवालों के बीच उनकी बहस का विषय है धर्म। बीमारी और बेबसी के दौर में मुँह से दूर होते निवालों के बीच उनकी बहस का...
Jawaharlal Nehru and Indira Gandhi

मज़हब की शुरुआत और काम का बँटवारा

अनुवाद: प्रेमचंद पिछले ख़त में मैंने तुम्हें बतलाया था कि पुराने ज़माने में आदमी हर एक चीज़ से डरता था और ख़याल करता था कि...
Nishant

कविता की परीक्षा

'Kavita Ki Pareeksha', a poem by Nishant Upadhyay ईश्वर की परिभाषा क्या है? हर धर्म के अपने ईश्वर होते हैं। धर्म की परिभाषा क्या है? धर्म ईश्वर से...
God, Abstract Human

ईश्वर की खोज

गर्दन उठाकर ईश्वर को आकाश में खोजने वालों तुमने ही धरती को रक्तपात दिया है तुमने ही हमें मज़हबों में बाँट दिया है तुम ही करते आए हो अपराध और...
Common Man

अम्बिकेश कुमार की कविताएँ

Poems: Ambikesh Kumar विकल्प उसने खाना माँगा उसे थमा दिया गया मानवविकास सूचकाँक उसने छत माँगी हज़ारों चुप्पियों के बाद उसे दिया गया एक पूरा लम्बा भाषण उसने वस्त्र माँगा मेहनताना उसे...
Naveen Sagar

ऐसा सोचना ठीक नहीं

शेर-चीता नहीं, मनुष्‍य एक हिंसक प्राणी है। हिंसा का बहाना चाहिए अहिंसा को ईश्‍वर का बहाना, सबसे ज़्यादा ख़ून बहाने वाला है सबसे ज़्यादा पवित्र बहाना। इसे नकारने का मानुष बहुत कम...
Women selling flowers outside a temple

कब्ज़ा

'Kabza', a poem by Amandeep Gujral दृश्य 1 एक निर्जन-सा चौराहा बड़ा सा पेड़ साँय-साँय करती हवा इक्का-दुक्का गाड़ियाँ मुट्ठी भर लोग दृश्य 2 एक छोटा-सा चौकोर पत्थर लाल-काली रेखाएँ थोड़ी-सी अगरबत्तियाँ और एक...
Religion, Religious, Hands, Hell

साक्ष्य

'Saakshya', a poem by Harshita Panchariya जाते-जाते उसने कहा था, नरभक्षी जानवर हो सकते हैं पर मनुष्य कदापि नहीं, जानवर और मनुष्य में चार पैर और पूँछ के सिवा समय...
Book

निशां नहीं मिटते

दुनिया की सारी पाक किताबें कहती हैं कोई वस्तु बेकार नहीं कोई हलचल, कोई बात कोई दिन, कोई रात कोई कण, कोई क्षण बेमतलब नहीं दुनिया की सारी पाक किताबें कहती हैं खून...

STAY CONNECTED

32,144FansLike
10,637FollowersFollow
20,684FollowersFollow
620SubscribersSubscribe

Recent Posts

Faiz Ahmad Faiz

इस वक़्त तो यूँ लगता है

इस वक़्त तो यूँ लगता है, अब कुछ भी नहीं है महताब न सूरज, न अँधेरा न सवेरा आँखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमन और...
Bheedtantra - Asghar Wajahat

‘भीड़तंत्र’ से दो लघु कहानियाँ

राजपाल एण्ड सन्ज़ से प्रकाशित असग़र वजाहत की किताब 'भीड़तंत्र' से साभार स्वार्थ का फाटक —“हिंसा का रास्ता कहाँ से शुरू होता है?” —“जहाँ से बातचीत का...
Pratibha Sharma

लाल रिबन

मेरे गाँव में सफ़ेद संगमरमर से बनी दीवारें लोहे के भालों की तरह उगी हुई हैं जिनकी नुकीली नोकों में नीला ज़हर रंगा हुआ है खेजड़ी के ईंट-चूने...
Subhadra Kumari Chauhan

यह कदम्ब का पेड़

यह कदम्ब का पेड़ | Yah Kadamb Ka Ped यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे। मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥ ले...
Sleepless, Person sitting

यह स्त्री सोयी नहीं है

बहुत अर्से से यह स्त्री सोयी नहीं है उसकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे इसका प्रमाण हैं समस्त सृष्टि को अपने आग़ोश में लेकर उसे विश्राम दिलाने का दावा करती रात्रि का...
Trilochan

तुम्हें जब मैंने देखा

पहले पहल तुम्हें जब मैंने देखा सोचा था इससे पहले ही सबसे पहले क्यों न तुम्हीं को देखा! अब तक दृष्टि खोजती क्या थी, कौन रूप, क्या रंग देखने को उड़ती थी ज्योति-पंख...
Amir Khusrow

अमीर ख़ुसरो के दोहे

अमीर ख़ुसरो के दोहे | Amir Khusro Ke Dohe ख़ुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग। तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग॥ ख़ुसरो...
Meena Keshwar Kamal

मैं कभी पीछे नहीं लौटूँगी

मैं वह औरत हूँ जो जाग उठी है अपने भस्‍म कर दिए गए बच्‍चों की राख से मैं उठ खड़ी हुई हूँ और बन गयी हूँ एक...
Dinkar

अवकाश वाली सभ्यता

मैं रात के अँधेरे में सितारों की ओर देखता हूँ जिनकी रोशनी भविष्य की ओर जाती है अनागत से मुझे यह ख़बर आती है कि चाहे लाख बदल...
Madan Daga

रेखांकित हक़ीक़त

किसने कह दिया तुम्हें कि मैं कविता लिखता हूँ मैं कविता नहीं लिखता मैंने तो सिर्फ़ जन-मन के दर्द के नीचे एक रेखा खींच दी है हाँ, दर्द के नीचे फ़क़त...
कॉपी नहीं, शेयर करें! ;-)