जालियों के छेद
इतने बड़े तो हों ही
कि एक ओर की ज़मीन में उगी
घास का दूसरा सिरा
छेद से पार होकर
साँस ले सके
दूजी हवा में

तारों की
इतनी भर रखना ऊँचाई
कि हिबिस्कॅस के फूल गिराते रहें
परागकण, दोनों की ज़मीन पर

ठीक है,
तुम अलग हो
पर ख़ून बहाने के बारे में सोचना भी मत
बल्कि अगर चोटिल दिखे कोई
उस ओर भी
तो देर न करना
रूई का बण्डल और मरहम
उसकी तरफ़ फेंकने में

बहुत कसकर मत बांधना तारों को
यदि खोलना पड़े उन्हें कभी
तो किसी के चोट न लगे
गाँठों की जकड़न सुलझाते हुए

दोनों सरहदों के बीच
‘नो मेंस लैंड’ की बनिस्पत
बनाना ‘एवेरीवंस लैंड’
और बढ़ाते जाना उसका दायरा

धर्म में मत बांधना ईश्वर को
नेकनीयत को मान लेना रब
भेजना सकारात्मक तरंगों के तोहफ़े

बाज़वक़्त
तारबंदी के आरपार
आवाजाही करती रहने पाएँ
सबसे नर्म दुआएँ!

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देवेश पथ सारिया
बतौर रचनाकार मैं मुख्य रूप से हिन्दी कवि हूं। अनुवाद कार्य एवं कथेतर-गद्य लेखन में भी कुछ रुचि रखता हूँ। साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, पाखी, आजकल, अकार, बया, बनास जन, मधुमती, कादंबिनी, समयांतर, समावर्तन, उद्भावना, जनपथ, नया पथ, आधारशिला, दोआबा, बहुमत, परिंदे, ककसाड़, प्रगतिशील वसुधा, अक्षर पर्व, मंतव्य, मुक्तांचल, रेतपथ, कृति ओर, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, उम्मीद, कला समय, पुष्पगंधा आदि पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दि सन्डे पोस्ट। वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, अनुनाद, बिजूका, समकालीन जनमत, पोषम पा, हिन्दीनेस्ट, शब्दांकन, कारवां, अथाई, हिन्दीनामा, लिटरेचर पॉइंट। सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध। ई-मेल: [email protected]