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Pallavi Vinod

यह समूची दुनिया नास्तिक हो जाए

'Yah Samoochi Duniya Nastik Ho Jae' by Pallavi Vinod "तो तुम्हारे हिसाब से ज़िन्दगी के कुछ निश्चित सूत्र होते हैं, ज़िन्दगी उन्हीं में ढली होती...
Supriya Mishra

सृष्टि निर्माण

'Srishti Nirmaan', a poem by Supriya Mishra ईश्वर की नज़र जब पहली बार औरत के स्तनों पर पड़ी तो प्रेरणा मिली पहाड़ बनाने की, फल फूलों से लदे वृक्ष, जड़ी बूटियाँ बनाने...
Anamika

सृष्टि

यह कविता यहाँ सुनें: https://youtu.be/PyRwDL29Xjg सृष्टि की पहली सुबह थी वह! कहा गया मुझसे तू उजियारा है धरती का और छीन लिया गया मेरा सूरज! कहा गया मुझसे तू बुलबुल है...
Atif Khan

दुनिया से हुए बैठे हो रू-पोश ऐ जाना

दुनिया से हुए बैठे हो रू-पोश ऐ जाना जल्वा भी सर-ए-आम है पुर-जोश ऐ जाना दिन दश्त में अच्छे से गुज़र जाता है अक्सर जब आता है...
Sumitranandan Pant

द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र

द्रुत झरो जगत् के जीर्ण पत्र! हे स्रस्त-ध्वस्त! हे शुष्क-शीर्ण! हिम-ताप-पीत, मधुवात-भीत, तुम वीत-राग, जड़, पुराचीन!! निष्प्राण विगत-युग! मृत-विहंग! जग-नीड़, शब्द औ' श्वास-हीन, च्युत, अस्त-व्यस्त पंखों-से तुम झर-झर अनन्त में हो...
premchand

दुनिया का सबसे अनमोल रत्न

"अगर तू मेरा सच्चा प्रेमी है, तो जा और दुनिया की सबसे अनमोल चीज़ लेकर मेरे दरबार में आ, तब मैं तुझे अपनी गुलामी में क़बूल करूँगी। अगर तुझे वह चीज़ न मिले तो ख़बरदार इधर रुख़ न करना, वर्ना सूली पर खिंचवा दूँगी।"
bhartendu harishchandra

जगत में घर की फूट बुरी

जगत में घर की फूट बुरी। घर की फूटहिं सो बिनसाई, सुवरन लंकपुरी। फूटहिं सो सब कौरव नासे, भारत युद्ध भयो। जाको घाटो या भारत मैं, अबलौं...
Nazeer Akbarabadi

क्या कहें दुनिया में हम इंसान या हैवान थे

क्या कहें दुनिया में हम इंसान या हैवान थे ख़ाक थे क्या थे ग़रज़ इक आन के मेहमान थे कर रहे थे अपना क़ब्ज़ा ग़ैर की इम्लाक...
Raghuvir Sahay

दुनिया

हिलती हुई मुण्डेरें हैं और चटखे हुए हैं पुल बररे हुए दरवाज़े हैं और धँसते हुए चबूतरे दुनिया एक चुरमुरायी हुई-सी चीज़ हो गयी है दुनिया एक पपड़ियायी...
Woman crying, Tears

एक दिन अश्रुओं के सैलाब से बच जायेगी दुनिया

'Ek Din Ashruon Ke Sailab Se Bach Jayegi Duniya', a poem by Vineeta Parmar रोना एक कला है और आँसू विज्ञान उसे कहते लड़कियों जैसा रोना मत। तुम...
Balkrishna Bhatt

संसार में भलाई अधिक है कि बुराई

"कलियुग है ऐसा बार-बार कह निश्चय किए बैठे हैं कि हम लोग नित्य-नित्य बिगड़ते ही जाएँगे, येन केन हम अपनी जिंदगी का दिन काट पूरा करें, बस हो गया। हम उनसे केवल इतना ही पूछते हैं कि क्या अमेरिका और यूरोप के देशों में तथा हमारे पड़ोस ही में जापानीज हैं, क्या वहाँ यह युग धर्म नहीं व्याप्ता? युग धर्म निगोड़ा भी क्या वही हते को हतता है?"

राख उड़ी होगी जग में, नरमुण्ड कहीं बिखरे होंगे..

तुम प्रेम परिधि के मध्यबिंदु हो, रौद्ररूप हो, शिव हो तुम गंगा को जूड़े में बाँधे माहेश्वर हो, शिव हो तुम कि जिसे अपने अपमान का क्षोभ...
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