मिथिला से छपरा तक,
बनारस से बलिया तक,
टालीगंज से बालीगंज तक,
देवरिया से विदिशा तक,
बैठी है तरुणी—
हर साल जने बच्चों को
सालों-साल सम्भालती।

सारा गाँव मर्दों से ख़ाली।
छोटा देवर भी
जाने की तैयारी में।
सौ पचास के फेर में
घर-घर से गया आदमी।
कभी आती है लाश उसकी
अफ़गानिस्तान से—
कभी इराक़ से ख़बर
लापता होने की—
कभी खो जाता वजूद उसका
नौ-ग्यारह के मलबे में,
कभी सो जाता वह समुद्र की
डूब गई कश्ती में।
लेकिन ज़्यादातर
अपनी नयी बीवी
और बच्चों संग
होता व्यस्त किसी चाल में।

रहता है ‘काली’ संग अमरीका में
वीसा की ख़ातिर—
ब्याहता है वृद्धा को, इंग्लैण्ड में
बसने की ख़ातिर—
जर्मन मालकिन की सेवा करता
जेल से बचने ख़ातिर—
दिन में बर्तन
रात में बिस्तर माँजता आदमी।

तरुणी नहीं जानती कहाँ
खोजे उसे—
नहीं बैठी वह कभी जहाज़ में,
नहीं जानती टिकट
या विदेसिया के बारे में।

कभी-कभार आए पैसे से
वह पोसती है बेटा
जिसकी रग़बत कुछ ठीक नहीं।
और पोसती है दो
छोटी-बड़ी लड़कियाँ अपनी।

कल घर के बाहर दिखे
कुछ ग़ैर क़िस्म के आदमी।
ऐसे ही आए थे परसाल भी।
मिली नहीं फिर धनिया की राधा,
न होरी काका की लिछमी,
कहाँ छुपा आए, तरुणी
ताड़-सी उम्र चढ़ रही गौरा अपनी।

‘राम जी, अगले जन्म हमें
पेड़ बना दीजो,
कीट पतंग या ढोर बना दीजो,
चिड़िया, दादुर, मोर बना दीजो,
पर अबला का फिर साप न दीजो’

संखिया की टोह में, रो रही तरुणी।

सुनीता जैन की कविता 'सौ टंच माल'

Book by Sunita Jain: