तस्वीर

एक तस्वीर
सदा से ख़ामोश
लगी हुई थी दीवार पर
मेरे सामने आते ही
पैकर में शिगाफ़ पड़ गया
और…
तस्वीर से रंग फूट पड़े!

रंग

बहुत तेज़ रफ़्तार गाड़ी से टकरा कर
मरती नहीं हैं तितलियाँ
वो फूट जाया करती हैं
जैसे कोई रंगों की पुड़िया
फूटती है, होली के रोज़
रंग चिपक जाते हैं गाड़ी पर
लेकिन
वो थोड़ी देर के बाद
घुल जाते हैं फ़ज़ा में
तितलियों के रंग बाक़ी नहीं रहते
उनके बाद!
उनके साथ चले जाते हैं..
सिर्फ़ एक रंग रह जाता है, काला!
तितलियाँ मरती नहीं
अँधेरा छोड़ जाती हैं..

तितलियाँ

मुसव्विर ने दुनिया ख़याल की
और फिर फूल ईजाद किये
फूल मगर ख़ामोश थे
सो खुशबुएँ दी गयीं
ख़ुशबुओं से मगर
सूरत कोई हासिल न थी
रंग हज़ारों तख़लीक़ किये गए
रंग दिए गए फूलों को
फूलों को ज़बान मिली
और मिला वजूद
रंग लेकिन उदास थे
फूल ना-अहल थे
खुशबुएँ थीं बेनियाज़
ज़िन्दगी कैसे मिले रंगों को
कुछ दिन तशवीश में रहा
फिर एक रोज़ मुसव्विर ने
रगों को तितलियाँ अता कर दीं!

चित्र श्रेय: Florin Tomozei

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