दो ज़िन्दा प्रेमियों का प्रेम
कभी एक जैसा नहीं दिखता
यह हो सकता है कि
एक मन देखता हो और
एक त्राण की सम्भावना

दो ज़ंग खायीं तलवारें
अलग-अलग युद्धों से आयी हों
ऐसा हो सकता है
एक ने अपने पूर्वजों का ख़ून देखकर
तज दी हो अपनी धार
एक ने काटा हो लोहा अपने मालिक का और
अपराधबोध में सड़ती चली आ रही

दो मिट्टी के बर्तन
साथ में ना टूटे हों
एक अविश्वास में टूटा हो
एक कर्तव्य परीक्षण में
यह भी सम्भव है

दो चोट खाए पक्षी
अपने घरों का पता भूलकर
एक ही आश्रय में आ बैठे हों
एक बहेलिये का पिंजड़ा तोड़कर भागा हो और
एक अपने ही घोंसले से गिरा हो
लौट चुके झंझावात की चपेट में आकर
सीखना दोनों को उड़ना ही है

दो नदियाँ एक दिशा में न बही हों
लेकिन उनकी धारों ने पकड़ लिया हो
एक-दूसरे का हाथ
बाँट लिया हो अपने दुःख का पानी कि
जाकर न बहाना पड़े नमक
ऐसे पारावार में
जिसे स्वयं अपने खारेपन का अनुमान न हो

दुःखों का रंग एक जैसा होता है
दुःख या तो पारदर्शी होते हैं
या फिर स्याह।

आदर्श भूषण की कविता 'सुनो तानाशाह!'
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आदर्श भूषण
आदर्श भूषण दिल्ली यूनिवर्सिटी से गणित से एम. एस. सी. कर रहे हैं। कविताएँ लिखते हैं और हिन्दी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है।

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