तुम्हारी आँखें
मखमल में लपेटकर रखे गए
शालिग्राम की मूरत हैं
और मेरी दृष्टि
शोरूम के बाहर खड़े
खिलौना निहारते
किसी ग़रीब बच्चे की मजबूरी

मैंने जब-जब तुम्हें देखा
ईश्वर अपने अन्याय पर शर्मिन्दा हुआ
और मज़दूर बाप अपनी फटी जेब में हाँथ डालते हुए
आसमान की तरफ़ देखकर बुदबुदाया

स्कूल की जिस सीट पर बैठती थीं तुम
वो मेरे स्वप्न में आती है
बिल्कुल अलग तरह से
किसी फ़लिस्तानी बच्चे की तरह चमकीली आँखें लिए
युद्ध के बीच शांति और प्रेम का पुनर्पाठ करती हुई

मैं तुम्हारे बालों को याद करता हूँ
और गहरी काली रातें मुझे अच्छी लगने लगती हैं
जब सब तरफ़ बंजर ही बंजर है
लोग भूख और प्यास के बीच
पेंडुलम की तरह दोलन कर रहे हैं
न जाने मुझे क्यों लगता है
तुम्हारे हरे रिबन से ही फूटेगी हरियाली
और आदमी
आदमी के गले लगकर ख़ूब रोएँगे
सब-एक दूसरे से माफ़ी माँगेंगे
सब-एक दूसरे को माफ़ कर देंगे

तुम्हारे एक कंधे से उगेगा सूरज
एक कंधे पर खिलेगा चाँद
और भीषण अंधेरे में तुम दिखाओगी रास्ता
मुझे लगता है जब सब
युद्ध में एक-दूसरे की
गर्दन काट रहें होंगे
तुम्हारे वक्ष
शान्ति कपोतों की तरह उड़ जाएँगे आकाश में
और सारे युद्ध, सारे अस्त्र-शस्त्र, सारी घृणा
धरे के धरे रह जाएँगे।

अनुराग अनंत की कविता 'आख़िरी इच्छा'

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अनुराग अनंत
अनुराग अनंत पत्रकारिता एवं जनसंचार में पीएचडी कर रहे हैं। रहने वाले इलाहाबाद के हैं और हालिया ठिकाना अंबेडकर विश्ववद्यालय लखनऊ है।

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