‘Tumse Bichhad Ke’, a poem by Ruchi

तुमसे बिछड़ने के बाद मैं उदास थी
सोच रही थी कि कैसे नींद आती होगी
मेरी बाँहों के घेरे के बिना कि तभी
उसने मुझे बाँहों में खींच लिया
और मैंने तुम्हारी नींद की चिंता छोड़ दी।

तुमसे बिछड़ने के बाद मैं उदास थी
सोच रही थी कि कैसे भूख लगती होगी तुमको
मेरे हाथों के कौरों के बिना पेट तो भरता न होगा
कि तभी उसने अपने हाथों का कौर मेरे मुँह में डाला
और मैंने तुम्हारी भूख की चिंता छोड़ दी।

तुमसे बिछड़ने के बाद मैं उदास थी
सोच रही थी कि कैसे तुम्हें चैन आता होगा
मेरी गोद में सर रखे बिना क़रार कैसे पाते होंगे
कि तभी वो मेरे सर को अपनी गोद में रख सहला उठा
और मैंने तुम्हारे चैन-ओ-क़रार की चिंता छोड़ दी।

तुमसे बिछड़ने के बाद मैं उदास थी
सोच रही थी कि कैसे तुम्हें सुकून मिलता होगा
मेरी आँखों के समन्दर में उतरे बिना कैसे राहत पाते होंगे
कि तभी उसने मेरी आँखों को चूम लिया
बन्द होते ही पलकों के, मैं तुम्हारा सुकूँ भूल गयी।

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