‘Upasthiti Anupasthiti’, a poem by Manjula Bist

गम्भीर व आत्मीय चर्चाओं में
उस वर्जित नाम का ज़िक्र आता रहा
जिसका प्रवेश जीवन-वृत्त में निषेध घोषित था

वांछित व अवांछित विदाई के बाद
रिक्त हुई जगह में
किसी के रहने का भान
उसके नहीं रहने में ज़्यादा होता रहा

साँसों की लय में
साँस छोड़ना
सदैव लेने से ज़्यादा महत्त्व रखती है।

कोई भी मृत्यु किसी एक क्षण में
मात्र… एक श्वास लेना भूल जाना ही तो था!

अनुपस्थिति,
एक तरह की अनिवार्य उपस्थिति होती है
अवांछित भी…!

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मंजुला बिष्ट
बीए. बीएड. गृहणी, स्वतंत्र-लेखन कविता, कहानी व आलेख-लेखन में रुचि उदयपुर (राजस्थान) में निवासइनकी रचनाएँ हंस, अहा! जिंदगी, विश्वगाथा, पर्तों की पड़ताल, माही व स्वर्णवाणी पत्रिका, दैनिक-भास्कर, राजस्थान-पत्रिका, सुबह-सबेरे, प्रभात-ख़बर समाचार-पत्र व हस्ताक्षर, वेब-दुनिया वेब पत्रिका व हिंदीनामा पेज़, बिजूका ब्लॉग में भी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

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