‘Ve Nitant Apne Kshan’, a poem by Saraswati Mishra

प्रेममयी मद से सिक्त
वे मादक सीत्कारें
जो कभी उसके नितांत अपने क्षणों में
गूँज उठती थीं मृदु संगीत-सी
वे ही एक दिन बदल जाएँगी चीत्कारों में
और वे नितांत अपने क्षण ही
साक्षी बन जाएँगे उन चीत्कारों के
जो, कभी अंतर्मन तो कभी देह से फूटती हैं

सच में,

यह कल्पना से परे था उस सुकुमार लतिका के
वह तो जी लेना चाहती थी एक पूरा जीवन
उन मद भरे पलों में ही
स्वयं को हारकर जीतना चाहती थी प्रेम

पर… वह पुरुष था
सीत्कारों की मधुर ध्वनियों से ऊबा हुआ
एक नए रोमांच की तलाश में,
आज़माए उसने विविध ढंग
अंततः आनंद पाया उसने
तरुणी की चीत्कारों में

वही अनोखी अव्यक्त संतुष्टि
जो कभी मादक सीत्कारों में थी
अब करुण चीत्कारों की पुनरावृत्ति में है…

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