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मूल व्याख्यान: हम सभी को फ़ेमिनिस्ट होना चाहिए (We Should All Be Feminists)
लेखिका: चिमामाण्डा न्गोज़ी आदीच्ये (Chimamanda Ngozi Adichie)
अनुवाद: दिव्याक्षी

जिस तरह से हम लड़कों की परवरिश करते हैं, उससे हम उनको ही बहुत नुक़सान पहुँचाते हैं। हमारी परवरिश उनके भीतर की मानवता का दम घोंट देती है। हमारा मर्दानगी को परिभाषित करने का तरीक़ा बहुत संकुचित है। मर्दानगी या मर्द होना—जैसे एक छोटा, सख़्त पिंजरा—जिसमें हमने लड़कों को या मर्दों को क़ैद कर दिया है।

हम लड़कों को डरने से, कमज़ोर महसूस करने से, भावुक होने से, डरना और भागना सिखाते हैं। हम उन्हें अपने वास्तविक आत्म, अपनी भावनाओं को दबाना और छुपाना सिखाते हैं क्योंकि वैसा ही होना तय कर दिया गया है। इसे नाइजीरियन भाषा में ‘हार्डमैन’ (सख़्त आदमी) कहते हैं।

अगर स्कूल के दो टीनेजर लड़का-लड़की कहीं जाते हैं, और दोनों ही के पास कम पैसे हैं, तब भी हमेशा लड़कों से बिल के पैसे भरने की उम्मीद रखी जाती है, ताकि वह अपनी मर्दानगी का सबूत दे सकें। (और फिर हम बाद में हैरानी जताते हैं कि लड़के ही क्यों ज़्यादा चोरी करते हैं?)

कैसा रहे कि अगर लड़के और लड़की, दोनों ही पैसे और मर्दानगी को आपस में न जोड़कर देखना सीखें? अगर उनमें ‘लड़का ही पैसा देगा’ की जगह ‘जिसके पास ज़्यादा पैसे हैं, वह दे दे’ की प्रवृत्ति हो तो कैसा रहे? ऐतिहासिक अनुकूल परिस्थितियों के कारण ज़ाहिर तौर पर आज अधिकतर लड़कों के पास ही ज़्यादा पैसे होंगे, लेकिन अगर हम अपने बच्चों की परवरिश का तरीक़ा बदल दें तो आज से पचास या सौ साल बाद, लड़कों पर भौतिक साधनों और पैसों के ज़रिए अपनी मर्दानगी साबित करने का दबाव नहीं होगा।

सबसे ग़लत जो हम लड़कों के साथ— ‘सख्त ही होना है’ की भावना भरकर करते है—वह है उन्हें एक बहुत नाज़ुक अहम् से ग्रस्त कर देना। जितना ज़्यादा एक मर्द सख़्त होने की विवशता महसूस करेगा, उतना ही ज़्यादा नाज़ुक उसका अहम् होता जाएगा।

और फिर हम लड़कियों को मर्दों के इस नाज़ुक अहम् और दम्भ के अनुसार जीना सिखाकर लड़कियों के साथ और ज़्यादा ग़लत करते हैं।

हम लड़कियों को संकुचित होना, सिमटना और ख़ुद को छोटा समझकर रहना सिखाते हैं।

हम लड़कियों से कहते हैं— “तुम ख़्वाब देखो लेकिन बहुत ऊँचे नहीं। तुम सफल होने की इच्छा तो रखो लेकिन बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी करने की नहीं, वरना तुम मर्दों को भयभीत कर दोगी। अगर एक मर्द के साथ अपने रिश्ते में कमानेवाली व्यक्ति तुम हो, तब भी ऐसे पेश आओ कि तुम नहीं हो, ख़ास तौर पर दुनिया के सामने, वरना तुम अपने पति को नामर्द साबित कर दोगी।”

लेकिन हम क्यों इस तर्क के मौलिक आधार पर ही प्रश्न नहीं उठाते? क्यों एक औरत की तरक़्क़ी मर्द के लिए ख़तरा मानी जाती है? क्यों हम इस सोच और नामर्द जैसे शब्दों को छोड़ नहीं देते? मुझे अंग्रेज़ी भाषा के emasculation (जिसका अर्थ नामर्दी है) से ज़्यादा नापसन्द शायद ही कोई शब्द हो।

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पेरियार का लेख 'पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के साथी'

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दिव्याक्षी जैन
जीवन की शुरुआत 1996 में हो गई थी, उसे जीना, समझना, समझ के लिखना और साझा करने की कला से अवगत कुछ वर्ष पूर्व हुई, और तब से पहाड़ों से निकली नदी सागर की ओर बढ़ने के लिए तत्पर है।

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