वहम

‘Weham’, a poem by Vijay Rahi

मैंने जब-जब मृत्यु के बारे में सोचा
कुछ चेहरे मेरे सामने आ गये
जिन्हें मुझसे बेहद मुहब्बत है।

हालाँकि यह मेरा एक ख़ूबसूरत वहम भी हो सकता है
पर यह वहम मेरे लिए बहुत ज़रूरी है।

मैं तो यह भी चाहता हूँ
इसी तरह के बहुत सारे वहम
हर आदमी अपने मन में पाले रहे।

गर कोई एक वहम टूट भी जाये
तो आदमी दूसरे के साथ ज़िंदा रह सके।

बच्चों को वहम रहे कि
इसी दुनिया में है कहीं एक बहुत बड़ी खिलौनों की दुनिया
वो कभी वहाँ जायेगें
और सारे खिलौने बटोर लायेंगे।

बूढों को वहम रहे कि
बेटे उनकी इज़्ज़त नहीं करते
पर पोते ज़रूर उनकी इज़्ज़त करेंगे।

औरतों को वहम रहे कि
जल्द ही सारा अन्याय ख़त्म हो जायेगा।

किसानों को वहम रहे कि
आनेवाली सरकार फ़सल का मनमाफ़िक मूल्य देगी।

मज़दूरों को वहम रहे कि
कभी उनको उचित मज़दूरी मिलेगी।

सैनिकों को वहम रहे कि
जल्द ही जंग ख़त्म होगी
और वो अपने गाँव जाकर काम में पिता का हाथ बँटायेंगे।

बेरोज़गारों को वहम रहे कि
कभी उनकी भी नौकरी होगी
जिससे वो दे सकेंगे अपने परिवार को दुनियाभर की ख़ुशियाँ ।

आशिकों को वहम रहे कि
कभी उनकी प्रेमिका उनको आकर चूमेगी और कहेगी
“मैं आपके बिना ज़िंदा नही रह सकती!”

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