सरेंडर-मार्च कराया जाए लोकतंत्र
माई लार्ड न्याय की शर्त लगाएँ
जब वर्दी हाँक रही संविधान
लहराती मुठ्ठियाँ नहीं चलेंगी।

चश्मे नहीं उतरने चाहिए
आँख नहीं मींची जाएँ
इस रात का अवसान क़बूल नहीं
ये भोर की अंगड़ाई नहीं चलेगी।

दर्ज हो रही उँगलियों की ग़लतियाँ
नए शब्द न सीखे, न लिखे जाएँ,
आग लगे कहीं धुआँ छाए
रोशनी का बहकना मंज़ूर नहीं,
क़ायदा सामूहिक भावनाओं के
प्रसारण का है,
स्वायत्त ज़ेहनियत नहीं चलेगी।

बूटों से रौंदी जाएँगी बच्चों की कश्तियाँ,
आज़ादी की पतंगें ड्रोन से कटेंगी,
धमाके से गूँजते हैं कान में किसी के
फ़ैज़-हबीब न गाये जाएँ,
हर नरमी का जवाब कोई वहशी देगा
तुम्हारे लहू का प्रमाण वो मुंशी देगा
फूलों की बग़ावत नहीं चलेगी।

जब मुक्त होंगे वो शेष शर्मिंदगी से,
आईपीसी उनके हथौड़े लिखेंगे,
उछाल दिए जाएँगे नक़ाब,
लेकर इत्मीनान नंगी सूरत
किताबों की सूचियाँ बनाने,
तुम्हारे टीवी का चैनल बदलने,
चौखट की पैमाइश करने,
अपनी शर्मिंदगी तुम्हें ओढ़ाने,
वो घर तक आएँगे,
ये काश, ये आह मंज़ूर नहीं,
साँस में शिकन नहीं चलेगी।

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