लड़की जानती है उसके हाथों में
सुख की रेखाएँ हल्की हैं
वह समय के बर्तन में
भय को घोंटते हुए साहस निथार रही है
उसे जीवन के कान मरोड़कर
दुख को मन के बाहर बैठाना आता है

आसमान देखता है लड़की को यूँ
गोया जानता हो
घर भीतर रहने वाली लड़की
जब चाहे आसमान सिर पर उठा सकती है
लड़की के भीतर का आसमान चिहुँक उठता है

हवा में पसरी बेचैनी, लड़की के चेहरे पर उतर आती है
लड़की ने अपने बालों को इच्छाओं के सुनहले रिबन के साथ कसकर गूँथ लिया है
हवा बहती है ऐसे कि रिबन के ढीले होते ही
इच्छाएँ हवा में बालों के साथ खुल जाएँगी

नदी शहर के छोर पर बहती है
लड़की की उदासी नदी के बहते जल में हिलोर बनकर उठती है
नदी का निनाद लड़की के भीतर उमगता है
लड़की के आसपास वर्जनाओं का कच्चा पक्का बाँध है
लड़की नदी की तरह जब भी बहेगी, बाँध दरककर ढह जाएगा।

***

शालिनी सिंह की कविता 'स्त्रियों के हिस्से का सुख'

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