युद्ध में जय बोलने वाले

‘Yuddh Mein Jai Bolne Wale’, a poem by Usha Dashora

एनुअल फ़ंक्शन में चुपचाप पेड़ बनने वाले
बच्चों की आँखों में बलैया लेता है सूरज
वहीं होता है सृष्टि के उजाले का लेखा-जोखा भी
उसी में से एक टुकड़ा रोशनी
रोज़ सुबह हमारी ओर फेंक देता है आसमान

जिसे तुमने सुनामी माना, दरअसल
वो समुद्री की खारी कविताओं को
तूफ़ानी अन्दाज़ में बाँचने वाले बच्चों का स्वर है
जिनके होंठ कभी सबसे पीछे खड़े होकर
समूहगान को उबालते रहे
पर माइक छूने की इच्छा एक बर्फ़ ही रखी

कई इच्छाएँ बर्फ़ रहना चाहती हैं
ताकि किसी एक मुस्कान को मिले खुला मैदान

मंच के पीछे टेबल जमाने वाले बच्चे
जिनके हाथों पर नहीं चढ़ पाया शीर्ष नायक का गाढ़ा रंग
पर उन दो हाथों ने दौड़कर बचाए कई घोंसले
उन्हीं हाथों ने रोपे धान के हज़ारों खेत
उन्हीं दो हाथों ने तारों की कंदराओं में रची श्रेष्ठ कहानियाँ

स्वअंहकार में कैसे विस्मृत हो गया? कि
युद्ध में जय बोलने वालों का भी बहुत महत्व होता है*

हमें चाहिए सीढ़ी के अन्तिम पायदान को सर्वप्रथम चूमना
हमें चाहिए अनगढ़ पत्थरों को नज़र के काले टीके लगाना
हमें चाहिए नाप-तौल वाली समस्त जीभों को उम्र क़ैद की सजा देना।

***

*यह पंक्ति कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के निबन्ध ‘मैं और मेरा देश’ से ली है

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