युद्धरत औरतें

‘Yuddhrat Auratein’, a poem by Santwana Shrikant

वो डरी हुई औरतें थीं
सोलह शृंगार कर भी
युद्ध कर सकती थीं,
नहीं हैं वे बदचलन!
चाहती हैं वे
पति की लम्बी उम्र
और रहना चाहती हैं
ताउम्र उनके साथ।
और जो औरतें
उनके विपक्ष में थीं
वो भी युद्ध कर रही थीं
सदियों से हो रहे
अन्याय के ख़िलाफ़
(परम्पराएँ जो औरतों को
अस्तित्वहीन बनाती हैं)
हालाँकि दोनों ही पक्ष
अपने-अपने हिस्से का
लड़ रहे थे युद्ध,
क्योंकि दोनों के
विरुद्ध था समाज,
दोनों ही रूप में
इन औरतों को
किया जा रहा था
तिरस्कृत और अस्वीकृत,
स्वीकृति नहीं दे पा रहा था समाज
क्योंकि-
वो शक्तिशाली हैं बहुत,
अंतत: विजयी होंगी।
अफ़सोस यह है कि
इस प्रक्रिया में
हर बार वे
बदचलन हो जाती हैं
और युद्धरत होने के लिए
तैयार हो जाती हैं
अगली दफ़ा के लिए।