’30 January’, a poem by Satyaprakash Soni

कमज़ोर-सा जिस्म था
शायद एक गोली से भी ख़त्म हो सकता था
हो सकता है गोली भी न चलानी पड़ती
कुछ दिन में अपने आप ही मर जाता
जिस्म ही तो था
तीन गोलियाँ बर्बाद कर दीं
और वो मरा भी नहीं
जिसका मरना मक़सूद था
वो तो ख़ुशबू-सा हवा में बिखर गया

हज़ारों गोलियाँ आज भी मारी जाती हैं
हज़ारों बार जलाया जाता है
फाँसी पर भी बेहिसाब बार लटकाया जाता है
सलीबों पर ठोका जाता है
काँच पीसकर पिलाया जाता है
चौराहों पर
सभाओं में
संसद में भी
किताबों और रिसालों में
पर वो मरता नहीं है
हर बार
किसी क़स्बे के छोटे स्कूल में
बच्चो के फ़ैन्सी ड्रेस में
कोई कमज़ोर-सा लड़का
हाथ में लकड़ी और कमर पर धोती बांध
हज़ारों ज़ेहनों में गाँधी खड़े कर देता है…

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