डॉ० अम्बेडकर के प्रति और अछूतों का उद्धार करने की उनकी इच्छा के प्रति मेरा सद्भाव और उनकी होशियारी के प्रति आदर होने के बावजूद मुझे कहना चाहिए कि वे इस मामले में बड़ी भयंकर भूल कर रहे हैं। उन्हें कड़वे अनुभवों में से गुज़रना पड़ा है, शायद इस कारण अभी उनकी विवेक-बुद्धि इस चीज़ को नहीं समझ पा रही है। ऐसे शब्द कहते हुए मुझे दुःख होता है। मगर यह न कहूँ तो प्राणों से प्यारे इन ‘अछूतों’ के हितों के प्रति मैं वफ़ादार नहीं रह सकता। सारी दुनिया के राज्य के लिए भी मैं उनके हक़ों की क़ुरबानी नहीं करूँगा। डॉ० अम्बेडकर तमाम हिन्दुस्तान के ‘अछूतों’ की तरफ़ से बोलने का दावा करते हैं, मगर उनका यह दावा सही नहीं है, यह बात मैं पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कहता हूँ। उनके कहने के अनुसार तो हिन्दू-समाज में फूट पड़ जाएगी। इसे शांति से देखते रहना मेरे लिए सम्भव नहीं है। (13-11-31 को लंदन में अल्पमत समिति की आख़िरी बैठक में दिए गए भाषण से)

बातें उसने बहुत मीठी कीं। उसमें सिद्धांत तो नहीं है, मगर ये सारी बातें सीधे ढंग से कीं। उसने यह भी कहा कि मुझे राजनैतिक सत्ता चाहिए थी सो मिल गई। अब मुझे तो राष्ट्रीय काम करना है। अब मैं आपके काम में रोड़े नहीं अटकाऊँगा। एम० सी० राजा यहाँ से जाकर आर्डिनेंस विल का समर्थन करें, वैसा मुझसे नहीं हो सकता। मैंने तो अपने आदमियों से कह दिया—अब तुम मुझसे इस काम में बहुत आशा न रखना। अब मुझे अपनी शक्ति देश के काम में ख़र्च करनी होगी। मगर आप बाहर निकलकर देश का काम शुरू करें तब हो। यों ही कुछ नहीं हो जाएगा।

अपने बारे में कहा—कहा जाता है कि सरकार मुझे रुपया देती है। मेरे जैसा भिखारी कोई नहीं। तीन साल से मेरी कुछ भी कमाई नहीं। यह काम करते हुए मुझे अपना रुपया ख़र्च करना पड़ता है और मेरे मुक़दमों का काम कम होता है। सार्वजनिक काम के लिए समय भी जाता है और रुपया भी ख़र्च होता है। थोड़े-थोड़े मुक़दमे मिलते हैं, उनसे अपना गुज़र चलाता हूँ। आज भी सावतवाड़ी में एक मुक़दमा है। वहाँ जाते हुए रास्ते में उतर गया हूँ। (महादेव भाई की डायरी, भाग 2, 17-10-32)

इसमें (अम्बेडकर में) त्यागशक्ति है। क़ुरबानी करने की शक्ति है। यह दावानल तो सुलगेगा ही। हम हिंदू यदि सच्चे होंगे तो यरवदा समझौते की तो स्वर्ण-भस्म बना सकेंगे, नहीं तो चार करोड़ अस्पृश्य सारे हिंदुस्तान का भक्षण कर जाएँगे। (महादेव भाई की डायरी, भाग 2, 3-12-32)

गत मई मास (सन् 1936) में लाहौर के ‘जात-पात-तोड़क मंडल’ का वार्षिक अधिवेशन होने वाला था और डॉ० अम्बेडकर उसके सभापति चुने गए थे। लेकिन डॉ० अम्बेडकर ने उसके लिए जो भाषण तैयार किया, वह स्वागत-समिति को अस्वीकार्य प्रतीत हुआ, जिसके कारण वह अधिवेशन ही नहीं किया गया।

यह बात विचारणीय है कि स्वागत-समिति का अपने चुने हुए सभापति को इसलिए अस्वीकार कर देना कहाँ तक उचित है कि उनका भाषण उसे आपत्तिजनक मालूम पड़ा। जाति-प्रथा और हिंदू-शास्त्रों के विषय में डॉ० अम्बेडकर के जो विचार हैं, उन्हें तो समिति पहले से ही जानती थी। यह भी उसे मालूम था कि वह हिंदू-धर्म छोड़ने का बिलकुल स्पष्ट निर्णय कर चुके हैं। डॉ० अम्बेडकर ने जैसा भाषण तैयार किया, उससे कम की उनसे उम्मीद ही नहीं की जा सकती थी। लेकिन समिति ने, ऐसा मालूम पड़ता है, एक ऐसे व्यक्ति के मौलिक विचार सुनने से जनता को वंचित कर दिया, जिसने कि समाज में अपना एक अद्वितीय स्थान बना लिया है। भविष्य में वह कोई भी बाना क्यों न धारण करें, मगर डॉ० अम्बेडकर ऐसे आदमी नहीं है जो अपने को भूल जाने देंगे।

डॉ० अम्बेडकर स्वागत-समिति से यों हार जाने वाले नहीं थे। उसके इंकार कर देने पर, उसके जवाब में उन्होंने उस भाषण को अपने ही ख़र्चे से प्रकाशित किया है। उन्होंने आठ आने उसकी क़ीमत रखी है, लेकिन मैं उनसे कहूँगा कि वह उसे घटाकर दो आना या कम-से-कम चार आना कर दें तो ठीक होगा।

यह भाषण ऐसा है कि कोई सुधारक इसकी उपेक्षा नहीं कर सकता। रूढ़िचुस्त लोग भी इसे पढ़कर लाभ ही उठाएँगे। लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि भाषण में ऐतराज़ करने लायक़ कोई बात नहीं है। इसे तो पढ़ना ही इसलिए चाहिए, क्योंकि इसमें गहरे ऐतराज़ की गुंजाइश है। डॉ० अम्बेडकर तो हिन्दू-धर्म के लिए मानो एक चुनौती हैं। हिन्दू की तरह पलने और एक ज़बरदस्त हिन्दू द्वारा शिक्षित किए जाने पर भी, सवर्ण कहे जानेवाले हिन्दुओं द्वारा अपने और अपनी जातिवालों के साथ होनेवाले व्यवहार से वह इतने निराश हो गए हैं कि वह न केवल उन्हें, बल्कि उस धर्म को भी छोड़ने का विचार कर रहे हैं जो उनकी तथा और सबकी संयुक्त विरासत है। उस धर्म को मानने का दावा करने वाले एक भाग के कारण सारे धर्म से ही वह निराश हो गए हैं।

लेकिन इसमें अचरज की कोई बात नहीं है, क्योंकि किसी प्रथा या संस्था का निर्णय कोई उसके प्रतिनिधियों के व्यवहार से ही तो कर सकता है। अलावा इसके, डॉ० अम्बेडकर को मालूम पड़ा है कि सवर्ण हिन्दुओं के विशाल बहुमत ने अपने उन सहधर्मियों के साथ, जिन्हें उन्होंने अस्पृश्य शुमार किया है, न केवल निर्दयता या अमानुषिकता का ही व्यवहार किया है, बल्कि अपने व्यवहार का आधार भी अपने शास्त्रों के आदेश को बनाया है और जब उन्होंने शास्त्रों को देखना शुरू किया तो उन्हें मालूम पड़ा कि सचमुच उनमें अस्पृश्यता और उसके लगाए जाने वाले तमाम अर्थों की काफ़ी गुंजाइश है। शास्त्रों के अध्याय और श्लोक उद्धृत कर-करके उन्होंने तिहेरा दोषारोप किया है (1) उनमें निर्दय व्यवहार करने का आदेश है, (2) ऐसा व्यवहार करने वालों के व्यवहार का धृष्टता-पूर्वक समर्थन किया गया है, और (3) परिणामस्वरूप यह अनुसन्धान किया गया है कि यह समर्थन शास्त्र-विहित है।

ऐसा कोई भी हिन्दू, जो अपने धर्म को अपने प्राणों से अधिक प्यारा समझता है, इस दोषारोप की गम्भीरता की उपेक्षा नहीं कर सकता, और फिर इस तरह निराश होने वाले अकेले डॉ० अम्बेडकर ही नहीं है। वह तो उनमें के एक ऐसे व्यक्तिमात्र हैं जो इस बात के प्रतिपादन में कोई समझौता नहीं करना चाहते और ऐसे लोगों में वे सबसे योग्य हैं। निश्चय ही इन लोगों में वह अत्यंत ज़िद्दी स्वभाव के हैं। ईश्वर की कृपा समझो जो बड़े नेताओं में ऐसे विचार के वही अकेले हैं और अभी भी वह एक बहुत छोटे अल्पमत के ही प्रतिनिधि हैं। मगर जो कुछ वह कहते हैं, कम या ज़्यादा जोश के साथ, वही बातें दलित जातियों के और नेता भी कहते हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि दूसरे—जैसे, रावबहादुर एम० सी० राजा और दीवानबहादुर श्रीनिवासन—हिन्दू-धर्म छोड़ने की धमकी नहीं देते, पर उसी में इतनी गुंजाइश देखते हैं कि जिससे हरिजनों के विशाल जन-समूह को जो शर्मनाक कष्ट भोगना पड़ रहा है, उसकी क्षति-पूर्ति हो जाएगी।

पर उनके अनेक नेता हिन्दू-धर्म को नहीं छोड़ते, इसी बात में हम डॉ० अम्बेडकर के कथन की उपेक्षा नहीं कर सकते। सवर्णों को अपने विश्वास और आचरण में सुधार करना ही पड़ेगा। इसके अलावा, सवर्णों में जो लोग अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर शास्त्रों की प्रामाणिक व्याख्या कर सकें, उन्हें शास्त्रों के यथार्थ आशय का भी स्पष्टीकरण करना होगा। डॉ० अम्बेडकर के दोषारोप से जो प्रश्न उठते हैं, वे ये हैं—

(1) शास्त्र क्या है?

(2) आज जो-कुछ छपा हुआ मिलता है, वह सभी क्या शास्त्रों का अभिन्न भाग है, या उनके किसी भाग को अप्रामाणिक क्षेपक मानकर छोड़ देना चाहिए?

(3) इस तरह काट-छाँटकर जिस अंश को हम स्वीकार करें, वह अस्पृश्यता, जाति-प्रथा, दर्जे की समानता, सहभोज और अंतर्जातीय विवाहों के सम्बन्ध में क्या कहता है? इन सब प्रश्नों की अपने निबन्ध में डॉ० अम्बेडकर ने योग्यतापूर्वक छानबीन की है। (हरिजन सेवक, 11-07-36)

अम्बेडकर साहब से तो दूसरी आशा ही नहीं थी। वह मेरा हमेशा विरोधी रहा है। वह मुझे मार भी डाले तो मुझे अफ़सोस न होगा। (बापू की कारावास कहानी, 20-09-42)

Book by Mahatma Gandhi:

Previous articleएक उमड़ता सैलाब
Next articleस्मृतियाँ अब भी प्रतीक्षारत हैं
महात्मा गाँधी
मोहनदास करमचन्द गांधी (२ अक्टूबर १८६९ - ३० जनवरी १९४८) भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह (व्यापक सविनय अवज्ञा) के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे, उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया। उन्हें दुनिया में आम जनता महात्मा गांधी के नाम से जानती है।