क्या तानाशाह जानते हैं
कि मुसोलिनी के
ज़हर उगलने वाले मुँह में
डाला गया था मरा हुआ चूहा
एक औरत ने सरेआम स्कर्ट उठाकर
मूत दिया था मुसोलिनी के मुँह पर
लटकाया गया था उसका मरा हुआ शरीर
‘और ऊपर, और ऊपर’ की चीख़ों के साथ
ताकि पूरा हुजूम देख सके

मुसोलनी का हश्र सुनकर ही
हिटलर ने कहा था
कि आत्महत्या के बाद जला दें उसका शरीर

तानाशाहों से पूछना चाहता हूँ मैं
कैसा महसूस करते हैं वे
अपनी पत्नियों और प्रेमिकाओं को गले लगाते समय
अपने बच्चों के गाल छूते समय
मृत माँ-बाप की तस्वीर के सामने खड़े हो
अपने युवा दिनों को याद करते हुए

क्या वे जानते हैं कि हरेक
उन्हीं की तरह किसी का सगा है, सम्बन्धी है

क्या उन्हें बीमारी में होती है तकलीफ़
चींटी काटने पर होता है दर्द…
क्या वे जानते हैं कि लोग
उनकी तंदुरुस्ती की नहीं, मौत की दुआ करते हैं

इतने सारे लोगों को कुचलते, मारते हुए
क्या वे भूल जाते हैं कि मौत महज़ परिकल्पना नहीं है
फच्च से कट सकते हैं एक दिन वे भी
किसी भी आम मनुष्य की तरह

दिन कभी भी फिर सकते हैं
हर शहर में मिस्त्र की तरह
एक तहरीर स्क्वायर होने की सम्भावना
खदकती रहती है!

देवेश पथ सारिया की कविता 'एक तारा-विज्ञानी का प्रेम'
देवेश पथ सारिया
हिन्दी कवि-गद्यकार एवं अनुवादक। पुरस्कार : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, स्नेहमयी चौधरी सम्मान। प्रकाशित पुस्तकें : (कविता संकलन) : अदृश्य आत्मीय की टोह में (2025), नूह की नाव (2022)। (कहानी संग्रह) : स्टिंकी टोफू (2025)। (कथेतर गद्य) : छोटी‌ आँखों की पुतलियों में (2022)। (अनुवाद) : यातना शिविर में साथिनें (2023), हक़ीक़त के बीच दरार (2021)। संपादन : गोल चक्कर वेब पत्रिका। अंग्रेज़ी, स्पेनिश, मंदारिन, रूसी, नेपाली, उर्दू, मराठी, बांग्ला, पंजाबी, भोजपुरी, गढ़वाली और राजस्थानी में कविताओं का अनुवाद।