‘Aakhir Thage Gaye Na’, a poem by Vandana Kapil

वो लड़का
जिसे हो सकता था प्रेम
किसी लड़की के
उठते उभारों से
नशीली आँखों से
शबनमी होंठों से,
लेकिन वो दिल हार बैठा
ईंटों की दीवारों पर,
चिपक गयी थीं उसकी आँखें
काठ के डेस्क-बेंचों पर,
वो साथी बहुत तंग करते थे
उसकी रातों में आकर
जो चुरा लिया करते थे अक्सर
इरेज़र उसके पेन्सिल बॉक्स से
और तोड़ देते थे पेन्सिल उसकी,
रोज़ लंच बॉक्स से
किसी परी के सुनहरी छड़ी-सी
ग़ायब हो जाती थी
आलू की फांकें,
हर शाम दोपहर
घर से भागकर
लड़का उन्हीं दीवारों के
चक्कर लगाता
और सोचता
इरेज़र चुराया न गया होता
तो मिटा देता वो उन निशानों को
जो आड़ी तिरछी खिंच जाती हैं
उसके ज़ेहन पर…

वहीं इक लड़की
जो बचा लिया करती थी
सबकी नज़र से
कुछ आलू की कतरनें
रोज उसके लिए
हर शाम उँगलियों में रेशमी धागा उलझाये
दिख जाती है मुझे
इस चाह में
कि जिस दिन लड़का देख लेगा उसे
इक नज़र
उस रोज़ वो सीख जायेगी
सलीका जीने का
और टाँक देगी
कुर्ते में उसके
बटन चाँद का
आह! प्रेम
तुम किस-किस तरह
कितनों को ठगोगे!

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