एक शाम हुआ करती थी
जो ढल गई
तेरे जाने के बाद ऐ दोस्त!
चाय की चुस्कियों में अब
मज़ा नहीं रहा।
बादल गरजते रहे, बरसते भी रहे
चौकोर टेबल,
और वो चार कुर्सियाँ
नज़र नहीं आतीं।
एक प्याला चाय,
और कई घंटे बातों के
खत्म नहीं होते थे डांट पड़ने के बाद भी।
फिर इंतजार अगली चाय का…
अब-
न वो शामें हैं,
न कोई दोस्त तेरे जैसा
सिर्फ उलझने हैं
और-
उलझनों की चाय-
अच्छी नहीं लगती।

* * *

अमनदीप / विम्मी

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