‘Alikhit Chitthiyaan’, a poem by Mridula Singh

तुम्हारे जन्म की
तारीख़ और जगह
नहीं जानती थी
पर तब भी पता था
कि इस दुनिया में तुम हो,
बनफूलों का
कुनमुना के आँख खोलना
ठूँठ का हरियाना
और तितलियों के पंखों पर
पीले रंग की चमक में
तुम्हारा ही होना था

उधर से आती हवा
बाँचती थी
तुम्हारी अलिखित चिट्ठियाँ
कि तुम्हारे देश में भी
इन दिनों जमी है धुन्ध
इसी धरती और
आकाश के बीच
गुज़रती किरणो में
बुना था तुमने
कोई भोला गुलाबी सपना

कहीं दूर छत पर कभी
कटती पतंगों को
तुमने सम्भाला होगा
बांधा होगा मज़बूत मांझे से
और उड़ा दिया होगा
उसे मेरी दिशा में
दुआओं की तरह

मिलना हुआ है तुमसे
इसी धरती पर
जहाँ नदी की दो धाराएँ मिलती हैं
वह पल नियोजित नहीं,
प्राकृतिक था
क़ुदरत के बाक़ी नियमों की तरह…

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मृदुला सिंह
शिक्षा- एम.ए., एम.फिल., पी.एच.डी., सेट | साहित्यिक गतिविधियों में भागेदारी, व्याख्यान, संचालन आदि | पूर्व प्रकाशन- सांस्कृतिक पत्रिका लोकबिम्ब, दैनिक युवा प्रवर्तक, इटारसी, जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ, प्रेरणा रचनाकार में लेख, कविताएँ लघुकथा का प्रकाशन | संपादक- राष्ट्रीय शोध पत्रिका रिसर्च वेब, स्मारिका | पुस्तक-संपादन- सामाजिक संचेतना के विकास में हिंदी पत्रकारिता का योगदान, मोहन राकेश के चरित्रों का मनोविज्ञान, सं. सरगुजा की सांस्कृतिक विरासत (प्रकाशाधीन), सं .ब्रम्हराक्षस (प्रकाशाधीन) | आकाशवाणी अम्बिकापुर से वार्ताएं और साक्षात्कार प्रसारित | बीस से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित | संप्रति- होलीक्रोस वीमेंस कॉलेज अम्बिकापुर में सहायक प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष (हिंदी) | मेल [email protected]