मूल रचना: ‘अँधेरे से उजाले की ओर’ –  अनुराधा अनन्या
रूपान्तरण: असना बद्र

मुँह अँधेरे घर के सारे काम करके
दूर के स्कूल जाती बच्चियाँ
धूप में तपता हुआ स्कूल
जिस के दर पे कनदा
“तीर्गी से रौशनी की सिम्त इक उठता क़दम”

घर से इक तज़लील सहकर
नौकरी पे आयी टीचर
अपने सूजे हाथ में इक चाक का टुकड़ा लिए
लिख रही है बोर्ड पर इंसान के बुन्यादी हक़

आठवीं दर्जे की छोटी हामला
ज़्यादती के बाद ख़ुद पर
रट रही है नस्ल के परवान चढ़ने का सबक़

मंच पर तक़रीर करती एक सरकारी मुलाज़िम
जिस के अंदर मुँह छुपाए
कसमसाते लफ़्ज़
बच्चा पालने को
जल्द छुट्टी के लिए लड़ती ज़बाँ
औरतों की तालियाँ

लौटती हैं बच्चियाँ
और दर्स देती ज़ुल्म सहने वालियाँ
और जल्द शादी के नतीजे हामला
माइक पे तक़रीर करती आलिमा

लौटती हैं
साथ सारी
उस डगर से जिस में वो स्कूल जिसके दर पे कनदा
“तीर्गी से रौशनी की सिम्त इक उठता क़दम”
लौटती हैं साथ लेकर अपनी अपनी रौशनी
और
साँझा ग़म…

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