बाल्टी में चाँद

आदमी नींद में था, बच्चा खेल रहा था, आसमान खुला था, चाँदनी भरपूर थी।

‘अब्बा, अम्मी कहाँ हैं?’, बच्चे ने खेलते-खेलते पूछा जैसे ये भी रोज़ का खेल था।

‘अल्लाह के घर’, आदमी ने नींद में ही कहा।

‘कहाँ, वहाँ आसमान पर?’

‘हाँ, आसमान पर..’

बच्चे ने ऊपर गौर से देखा, ‘वहाँ, चाँद पर?’

आदमी ने आँख पर से हाथ हटाया, चाँद की तरफ़ देखा, कुछ सोचता रहा और कहा, ‘हाँ बेटा चाँद पर, अब सो जाओ!’

बच्चा खुशी से उछल पड़ा, ‘अब्बा बाल्टी में चाँद है..’

‘नहीं बेटा, वो चाँद का अक्स है, असली चाँद ऊपर है, आसमान पर!’, लेकिन इतने में बच्चे ने बाल्टी में हाथ डाल दिया था, पानी छलक गया। फिर बच्चा हाथ उठा-उठा कर आसमान का चाँद पकड़ने की कोशिश करने लगा, उसे इस खेल में मज़ा आने लगा था।

‘बेटा अब सो जाओ, चाँद हमारी पहुँच से बहुत दूर है’, आदमी ने कहा और चौंक कर उठ बैठा।

नींद कही दूर जा चुकी थी।