बन्दूक़

‘Bandooq’, Hindi Kavita by Paritosh Kumar Piyush

(एक)

उन्होंने तुम्हें कभी नहीं कहा
बन्दूक़ उठाओ
उन्होंने बस रख दिया
तुम्हारे हाथों में धर्मग्रंथ…

(दो)

उन्हें सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए
बन्दूक़ नहीं उठानी होती है
वे बड़े चालाक हैं
उन्होंने बख़ूबी जान लिया है
तुम्हारी कमज़ोरी तुम्हारा ईश्वर है
इसलिए वे बोते हैं
तुम्हारे भीतर धर्म का बीज
ताकि तुम ख़ुद ही अपने हाथों में
तान लो अपने-अपने धर्म की बन्दूक़ें

और वे बड़े आराम से
तुम्हारा शासक बन चरते रहें
तुम्हारी पूरी आवाम को…

(तीन)

उसे बलात्कार करना था
उसने बन्दूक़ नहीं निकाली
गोलियों की छर्रियाँ भी नहीं दिखायीं
न ही उसने लड़की को
चाकू दिखाकर भयभीत किया

उसने बड़े आराम से चखा
अलग-अलग अंगों का
अलग-अलग स्वाद
फिर किया बलात्कार

उसने पढ़ लिया था
एक लड़की के भीतर का कमज़ोर पक्ष
उसे मालूम था बलात्कार से पहले
प्रेम का सारा समीकरण…

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