‘चलो’
कहो एक बार
अभी ही चलूँगी मैं—
एक बार कहो!
सुना तब ‘हज़ार बार चलो’
सुना—
आँखें नम हुईं
और
माथा उठ आया।
बालू ही बालू में
खुले पैर, बंधे हाथ
चांदी की जाली में सिमट
बहुत दूर—
बहुत दूर नीलम का सागर तब
उमड़ पास आया।

अनछुए, अनसीमे
फिसले, अबरकी और
इन्द्रजाल तट पर
हम चलें।

कहाँ?
लहरों पर तिरें!
कहाँ?

खोज, भटक
मधु पाकर
पीछे ही लौटेंगे?
लौटेंगे भी तो क्या
साहस से तिल-तिलकर
पल-पल झुरने ही को?

चलना-भर सोचोगे
ऐसा क्या होता है।
लहरों में उतरोगे
है इतना हल्का मन।

इन्दु जैन की कविता 'इधर दो दिन लगातार'

Book by Indu Jain: