‘Idhar Do Din Lagataar’, a poem by Indu Jain

इधर दो दिन लगातार तुमसे मिलने के बाद
लगा
कि हमारे अचानक-बँधे सम्बन्धों में
मीठी नरम घास उगने लगी है।

यह लगने लगा
कि
इसकी ठण्डी हरियाली ही थी
वह-
जिसके लिए बरसों से
आँखें धुँधली थीं
जल रही थीं।

और यह भी
कि
ज़्यादा पास आने से टूट जाने वाला प्यार
बिना पास आये पनपता नहीं।
मैं तुम्हारे नज़दीक आऊँ?
या
दूर हट जाऊँ?

मैं ख़तरा उठा लूँ?
या घुटने टिका दूँ?

तुम्हारी आँखों के पिघल जाने की उम्मीद में
रुकूँ
या पहले ही डर कर मान लूँ-
तुम्हारी आँखें
नहीं हैं मेरा घोंसला-
और उड़ जाऊँ?

मैं क्या करूँ?

हमारे अकस्मात्-बँधे
ऊसर सम्बन्धों में
मिठास आने लगी है।

(1 सितम्बर, 1964)

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